कविता:-- रिश्ता टूट जाते हैं//कवि गौरव झा//

रिश्ता मैं कम ही बनाता हूँ
कुछ रिश्ते को निभाता हूँ
अक्सर ज्यादा रिश्ते टूट जाते हैं
क्योंकि मैं कितना भी आगे वाले को समझाऊं,
उसे कभी-कभी समझा नहीं पाता,
उल्टे गलत कहानी बता जाता
मैं सुनकर हँसता,वो पूछता
उसकी बातों को सुनकर कुछ न सूझता
उसे अक्सर माफ करता,
मेरी मस्तिष्क मुझे कहती
तू इसे माफ़ कर दें,
यह तुमसे  उम्र में भी है बड़ा,
तेरे चिंतन के सामने है नतमस्तक
मिट्टी को पीट-पीटकर कुंम्हार,
सुंदर बना देता है वह घड़ा,
रिश्ता मैं कम ही बनाता हूँ,
उसमें कुछ रिश्ते को निभाता हूँ,
उसे ही अनकही किस्से बताता हूँ,

Comments