ग़ज़ल//कवि गौरव

इस शहर में आजकल शख़्स झूठ बोलता है,
आईना ही हर-दौर में सबका राज़ खोलता है।

चंद मसीहा है बना बैठा अपने शहर में आज,
गज़ब है आजकल कोयले को हीरा बोलता है,

राज़ की बात है बिकता है बाजारों में ईमान,
देखों शहर के परिंदें भी ऊँची उड़ान उड़ता है।।

सुनाने लगा है मसीहा यहाँ अपनी मन की बात,
यहाँ तो हर शख़्स ही मीठी जुबान बोलता है।।

गौरव ज़माने में बन बैठा है सियासत के पुजारी,
इस शहर का आईना ही यहाँ पत्थर बोलता है।।

अंज़ाम से डरते वो जिसके आंखों में अंगारे न हो,
धरा पे हर शख़्स अभी जनहित की बात बोलता है।।

अपना है ये मुल्क में इरादे रखते नहीं कभी भी नेक,
आजकल मसीहा भी तो ख़ुद मीठी जुबां बोलता है।

जुबां ही है जिसकी यहाँ पे हिंदी और उर्दू,ए दोस्त
अदब से वहीं शख़्स सर झुकाकर यहाँ बोलता है।।

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