ग़ज़ल
याद जब तुम्हारी मुझे आती है,
कमबख्त मुझे बहुत रूलाती है।
तन्हाई में अक्सर ख़ुद जीता हूँ,
ग़म तुम्हारे भी हर रोज़ पीता हूँ।
गुफ्तगू तुझसे ना हो कोई बात नहीं,
तिरी याद ही मुझे बहुत सताती है।
चहरे तुम्हारे कभी भूल न पाया बेशक
लगता है कमरे में आके तुम समझाती हो।
याद आती है तुम्हारी जब भी मुझे
अपने पास आते आहट सुनाई देती है।
मरकर भूलाना न मुश्किल होगा कभी,
क्या कहूँ तिरी याद मुझे हर रोज़ आती है।
ख्वाईश इंसान को कभी जीने नहीं देती,
आँखों से गिरी आसूँ तिरी बहुत सताती है।

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