ग़ज़ल

ज़िंदगी जीना यूँ कहें तो उस ख़ुदा के हाथ में है,
तुमसे मिलकर दूर-दूर रहना मुकद्दर की बात है।

नहीं है मिलती अंज़ाम-ए इश्क़ ये मंज़िल साथ में,
छुट जाते हैं रास्ते,मंज़िल पछताना पड़ता बाद में।

तमाम रातें छोटी पड़ जाती इक नाम को भुलाने में,
रहता नहीं आसां डगर जीवन का यही बात जताने में।

छोड़ जाती अपनी ही ये परछाईयाँ बेशक अपना साथ,
फासले बेइंतहा हो ,रह जाते अनकहे क़िस्से सुनाने में।

ख़बर है नहीं बेशक तुझे ख़ुद के बारे में तुझे ए नादान,
जाया नहीं करता अपना वक्त हर चीज़ तुझे यूँ बताने में।

तन्हाई में कट चुकी है बेवजह अपनी तमाम ये सारी रातें,


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