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कविता

कह दो हिंदुस्तान के दुश्मनों से आज ये,
है आज वहीं चमक हिंद के शमसीर में।

इसी मिट्टी पे शहीदों ने खेली खून से होली,
यू ही नहीं बसते वो अपने देश के ज़मीर में।।

खैरात के दम पे पले वो सदा मुल्क पाकिस्तान है,
बहोत नफरतें अब बाँटी हमारे स्वर्ग से काश्मीर में।

नहीं हो सका जो अपने मुल्क का,न होगा ख़ुदा का,
है क़ौम वो दहशत का अब ये दुनिया के तस्वीर में।।

पनाह देते जो आतंक को, बाँटते हैं हर दिन वो ज़हर,
लगाते ख़ुद ही  आग आजकल अपने ही ज़मीर में।।

कैसे कह दूँ ज़रा आतंकों का जमीं पे कोई धर्म नहीं,
"गौरव" पहचानना मुश्किल अब दुनिया के इस भीड़ में।

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