ग़ज़ल : तुम हो परिंदा / गौरव झा

   

      GAURAV JHA

 ( Journalist, Writer & Columnist )

तुम हो परिंदा, तुम्हें उड़ना नहीं आता,

फ़कत इक दिन में मुझे उड़ाना नहीं आता।

शरारत से गुजर कर कुछ नहीं होता है हासिल,
इसलिए तेरे सवाल मुझे समझाना नहीं आता।

नफ़रत की दहकती चिंगारी हैं तेरे अंदर,प्यारे
पूछते हो रोज़ सवाल, तुझे सिखना नहीं आता,

नहीं है ज़िंदगी में कुछ भी तुझे सीखने की चाह,
शायद तुम कहते उसे सही से बताना नहीं आता।

जाते हो तुम समंदर के पास,कुछ उम्मीद लेकर,
नदियों की धार से अपनी बात जताना नहीं आता।

बिखरे पड़े,सुनसान पहाड़ों के बगल में कुछ पत्थर,
कोहिनूर जैसे बेशकीमती पत्थर तुझे उठाना नहीं आता।

---@ GAURAV JHA

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