दिल्ली का सबसे अनोखा ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम : ट्वाॅयलेट का दिलचस्प सफर / Sulabh International Museum Of Toilets / Gaurav Jha
(Writer,Journalist & Columnist)
दिल्ली की भीड़-भाड़ से थोड़ी दूर। नई दिल्ली में दशरथ पुरी मैट्रो स्टेशन से कुछ दूरी पर स्थित है- सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स। यह स्थित है, पालम, महावीर एनक्लेव,डाबरी रोड,नई दिल्ली में। दरअसल एक ऐसी जगह, जिसके बारे में सुनकर लोग पहले हँसते हैं और फिर हैरान रह जाते हैं। क्या आपने कभी 'टॉयलेट म्यूज़ियम' के बारे में सुना है? यह कोई मजाक नहीं है। यह है दुनिया का अनोखा संग्रहालय सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स, जो स्थित है,महावीर एनक्लेव,पालम,नई दिल्ली में। लेकिन सवाल यह है ट्वाॅयलेट का भी म्यूज़ियम? आखिर क्यों इस कहानी की शुरुआत होती है एक इंसान से, पद्मविभूषण से अलंकृत,समाज-सुधारक,स्वच्छता के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक जी से।
गौरतलब 'म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स' सिर्फ एक म्यूज़ियम नहीं... यह एक ऐसी कहानी है, जो हमें इंसान की सभ्यता का सबसे अनदेखा सच दिखाती है। दरअसल, कहानी की शुरुआत होती है एक आम इंसान से, जिसने एक दीपक की तरह अपनी रोशनी से लाखों स्कैवेंजर, अस्पृश्य तथा समाज के वंचित गरीब तबक़े के लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला दिया। स्कैवेंजरों के सामाजिक उत्थान, सामाजिक कल्याण, सामाजिक सम्मान, स्वच्छता,सर पर मैला ढ़ोने जैसी अमानवीय कुप्रथा को समाप्त करने के लिए पद्मविभूषण,समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी जीवन भर संघर्षरत रहे। वे एक दीपक की तरह देश ही नहीं, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रकाश से अंधेरा मिटाने का निरंतर काम किया।आज उसी का परिणाम है कि लाखों लोगों के जीवन में नयी ऊर्जा का संचार हुआ है । 'सुलभ इंटरनेशनल' के संस्थापक तथा पद्मविभूषण से सम्मानित,युग-दृष्टा,समाज-सुधारक डॉ.विंदेश्वर पाठक जी थे।जब उन्होंने समाज में गंदगी,बीमारियां और अपमान को बेहद क़रीब से देखा तो उन्होंने एक मिशन शुरू किया, जिसका नाम था 'सुलभ इंटरनेशनल'। लेकिन सिर्फ़ शौचालय बनाना ही उनका लक्ष्य नहीं था। वे चाहते थे कि लोग समझें। स्वच्छता का इतिहास भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उसका वर्तमान ।
दरअसल, सुलभ इंटरनेशनल शौचालय - संग्रहालय वैसे समाज का वर्णन करता है,जो स्वच्छता के क्षेत्र में दूसरों की पीड़ा और कष्ट का बोध कराती है। 'म्यूज़ियम ऑफ ट्वाॅयलेट्स' हमें यह सिखाती है कि खाना और शौच करना शरीर के आवश्यक कार्य हैं। इसमें कहना चाहूंगा कि मनुष्य खाना को अत्यधिक ज़रूरी और महत्वपूर्ण समझता है लेकिन शौच को नहीं । स्वस्थ मन, स्वस्थ तन और मानसिक तनाव को दूर करने के लिए एक जितना महत्वपूर्ण है,उससे कहीं ज्यादा दूसरा।
समाज - सुधारक, पद्मविभूषण सहित अनेकानेक सम्मान से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी, समाज के निम्न तबक़े के लोगों के उत्थान के लिए जीवन भर अपना सफर अनवरत जारी रखा। सफ़र शुरू करने के पश्चात उन्हें काफ़ी कुछ सहना पड़ा।
लोग हँस, ताने दिए, शौचालय बनाकर देश बदलेगा। इस प्रकार के विचार और प्रतिक्रिया थे लोगों के उनके प्रति। लेकिन उन्होंने हार नहीं माना। बीते दशकों में उन्होंने अपनी चुनी हुई दिशा में जो काम अनवरत उन्होंने किया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी 'बापू' के विचारों पर चलकर एक आम आदमी, एक युवा समाजसेवी, पद्म-विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी ने सिर्फ़ महात्मा गांधी जी का सपना पूरा नहीं किया, बल्कि उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट सामाजिक कार्य ने उन्हें समूचे देश ही नहीं, वरन् अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उन्होंने देश भर में वह काम करके दिखाया, जो एक सामान्य व्यक्ति के सोच में भी परे है। उनकी दूरदर्शिता सोच,संकल्प, दृढ़विश्वास, काम के प्रति निष्ठा,धैर्य और समर्पण यह दिखाती है कि, "दुनिया में असंभव कुछ नहीं होता, बस व्यक्ति की सोच बड़ी होनी चाहिए।" 'आदमी के साहस से बढ़कर कुछ नहीं होता है।'
लिहाज़ा दिल्ली की भीड़-भाड़ सड़कों के बीच एक ऐसी जगह छिपी है, जहाँ क़दम रखते ही आप एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं-------------- 'ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम' जिन्हें हम म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स' के नाम से भी जानते हैं,जो स्थित है महावीर एक्कलेव,पालम, डाबरी रोड,नई दिल्ली में। हालाँकि शौचालयों का इतिहास हड़प्पा, सिंधु घाटी सभ्यता और मु-अन-जोदड़ो की संस्कृतियों जितना प्राचीन है।यहाँ तक कि मुगलकाल में अकबर के राजभवन के अतिरिक्त राजस्थान में भी इसके अवशेष प्राप्त हुए हैं........... [ शेष फिर कभी ]
@WriterGauravJha
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