Skip to main content

जीवन का संपूर्ण सार है साहित्य।

जीवन का उद्देश्य ही आनंद है।मनुष्य जीवन हमेशा आनंद की खोज में लगा रहता है।किसी को वह रत्न द्र्व्य धन से मिलता है। किसी को भरे पूरे परिवार से किसी को लम्बा चौड़े भवन से , किसी को ऐश्वर्य से , लेकिन साहित्य का आनंद इस आनंद से ऊँचा है। इससे पवित्र है, उसका आधार सुन्दर और सत्य है वास्तव में सच्चा आनंद सुन्दर और सत्य से मिलता है।उसी आनंद को दर्शाना वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देश्य है। ऐश्वर्य आनंद में ग्लानि छिपी होती है।उससे अरुचि हो सकती है। पश्चाताप की भावना भी हो सकती है।पर सुन्दर से जो आनंद प्राप्त होता हे वह अखंड अमर है। ” जीवन क्या है ? जीवन केवल जिन खाना -सोना और मर जाना नहीं है।  यह तो पशुओं का जीवन है।मानव जीवन में भी यही सब प्रवृत्तियाँ होती है।क्योंकि वह भी तो पशु है,पर उसके उपरांत कुछ और भी होता है, उसमे कुछ ऐसी मनोवृत्तियां होती है, जो प्रकृति के साथ हमारे मेल में बाधक होती है। जो इस मेल में सहायक बन जाती है।जिन प्रवृत्तियाँ में प्रकृति के साथ हमारा सामंजस्य बढ़ता है।वह वांछनीय होती है,जिनमे सामंजस्य में बाधा उत्पन्न होती है , वे दूषित है,अहंकार क्रोध या द्वेष हमारे मन की बाधक प्रवृत्तियाँ है। यदि हम इन्हें बेरोक-टोक चलने दे तो निसंदेह वो हमें नाश और पतन की और ले जायेगी इसलिए हमें उनकी लगाम रोकनी पड़ती है।उन पर संयम रखना पड़ता है।जिससे वे अपनी सीमा से बाहर न जा सके हम उन पर जितना कठोर संयम रख सकते है।उतना ही मंगलमय हमारा जीवन हो जाता है।”

” साहित्य ही मनोविकारों के रहस्यों को खोलकर सद्वृत्तियो को जगाता है।साहित्य मस्तिष्क की वस्तु बल्कि ह्रदय की वस्तु है। जहाँ ज्ञान और उपदेश असफल हो जाते हे वह साहित्य बाज़ी मार ले जाता है।साहित्य वह जादू की लकड़ी है,जो पशुओ में ईट पत्थरों में पेड़ -पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देता है। ”
        ”जीवन मे साहित्य की उपयोगिता के विषय में कभी- कभी संदेह किया जाता है। कहा जाता है कि जो स्वभाव से अच्छे हे वो अच्छे ही रहेंगे। चाहे कुछ भी पढ़े जो बुरे है,वो बुरे ही रहेंगे चाहे कुछ भी पढ़े।इस कथन में सत्‍य की मात्रा बहुत कम है।इसे सत्य मान लेना मानव चरित्र को बदल देना होगा। मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल प्रपंच या परिस्थितियों से वशीभूत होकर वह अपना देवत्य खो बेठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है।उपदेशों से नहीं,नसीहतो से नहीं भावो से मन को स्पंदित करके , मन के कोमल तारो पर चोट लगाकर प्रकृति से सामंजस्य उत्पन्न करके।हमारी सभ्यता साहित्य पर ही आधारित है। हम जो कुछ है,साहित्य के ही बनाए है।विश्व की आत्मा के अंतर्गत राष्ट्र या देश की आत्मा एक होती है। इसी आत्मा की प्रतिध्‍वनि हे ‘ साहित्य ‘ ”।
          ”हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते है।शायद हम समझते है कि मज़ेदार चटपटी और ओज़पूर्ण भाषा में लिखना ही साहित्य है।भाषा भी साहित्य का अंग है।पर स्थायी साहित्य विध्वंस नहीं करता है।निर्माण करता है।वह मानव चरित्र की कालिमा ही नहीं दिखलाता है।उसकी उज्वलताय दिखाता है।मकान गिराने वाला इंजिनियर नहीं कहलाता इंजिनियर तो निर्माण ही करता है।हममे से जो युवक साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते उन्हें बहुत ही महान संयम की आवशयकता होगी क्योंकि वह अपने को एक महान पद के लिए तैयार कर रहे हैं।साहित्यकार को आदर्शवादी होना ही चाहिए। अमर साहित्य के निर्माता विलासी प्रवृति के मनुष्य नहीं थे ।कबीर भी तपस्वी ही थे ” हमारा साहित्य अगर आह उन्नति नहीं करता है।तो इसका कारण यहीं है कि हमने साहित्य रचना के लिए कोई तैयारी नहीं की – दो चार नुस्खे याद करके हाकिम बन बैठे साहित्य का उत्थान राष्ट्र का उत्थान है।और हमारी ईश्वर से यही याचना है।कि हममें सच्चे साहित्य सेवी उत्पन्न हो ,सच्चे तपस्वी सच्चे आत्मज्ञानी .”
                      ------- @💐आपका कलमकार गौरव झा

Comments

Popular posts from this blog

जयपुर का गुलाबी रत्न 'हवा महल' : इतिहास,अद्भुत वास्तुकला और पर्यटन का बेजोड़ संगम

        GAURAV   Jha   ( Writer , Columnist & Journalist ) ---------‐--------------------------‐----------------------------------------- राजस्थान अपनी संस्कृति, वेशभूषा, पहनावा, त्योहारों और संगीत के अलावा अनोखे खूबसूरत, प्रसिद्ध किलों के लिए काफ़ी मशहूर है। अगर आप घूमने के शौकीन हैं तो आप घूम सकते हैं। जी हाँ! आप राजस्थान के जयपुर शहर में घूमने का प्लान बनाएँ। क्योंकि घुमना अथवा घुमक्कड़ी करना भी एक कला है, घुमक्कड़ी के दौरान जहाँ भी घुमने जाइए। आप उस राज्य की संस्कृति, पहनावे, त्योहारों और खान-पान का लुत्फ़ उठाईए ।यकीनन उस राज्य के लोगों के बारे में जानिए, समझिए, थोड़ी बहुत गुफ्तगू कीजिए। किसी भी देश अथवा राज्य की असली पहचान वहाँ की संस्कृति, कला, शिक्षा-प्रणाली, त्योहारों,नृत्य-संगीत और वहाँ के इतिहास से होती है। राजस्थान के कई शहर ऐसे हैं, जहाँ जाकर इतिहास के पन्नों को एक बार फिर पलटने का मन करने लगता है। ऐसी ही एक खूबसूरत शहर है 'जयपुर, जो राजस्थान की राजधानी भी है। यहाँ राजा-महाराजाओं के ऐतिहासिक किले और वहाँ की वास्तुकला, ऐतिहासि...

यात्रा-वृतांत : दिल्ली से माता मनसा देवी मंदिर पंचकुला तक मेरी अद्भुत,यादगार और अविस्मरणीय यात्रा/ Gaurav Jha

   Mansa Devi Temple Panchkula |  यात्रा-वृतांत | दिल्ली से पंचकुला तक मेरी अविस्मरणीय यात्रा | Gaurav Jha __________________________________         Gaurav JHA ( WRITER,COLUMNIST &JOURNALIST )   मेरी इस यात्रा का पहला पड़ाव था - श्री माता मनसा देवी मंदिर, जो स्थित है पंचकुला, हरियाणा में। पंचकुला में स्थित माता मनसा देवी का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।मनसा देवी मंदिर जो पंचकुला, हरियाणा में स्थित है। मैंने अपनी यात्रा की शुरुआत नई दिल्ली से की। प्रात: सूर्य की लालिमा धरा पर पड़ रही थी। सुबह का तकरीबन 6:00 बज रहा था। हमनें मन में ठान लिया था कि मनसा देवी मंदिर घूमना है,माता का दर्शन करना है। जी हाँ! आखिर ऐसा क्यों न हो? माता का दर्शन सौभाग्य से जो मिलता है। जब भी मनसा देवी माता का कृपा अथवा उनका आदेश होगा।आप भारत के किसी कोने में रहेंगे।आप माता के दरबार में पहुँच ही जाऐंगें।                   हालांकि माता मनसा देवी, भारत के हरियाणा राज्य के पंचकुला जिले में स्थित...

हिंदी कविता : गांव की यादें // गौरव झा

  GAURAV JHA  ( Journalist, Writer & Columnist ) चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार  गाँव की याद आती है बहुत मेरे यार।। सिखता आ रहा हूँ,बहुत कुछ गाँवों में रहता हूँ,हर वकत बुजुर्गो के छाँवों में। चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार गाँव की  याद आती है बहुत मेरे यार।। मिलता था माँ का प्यार सदा गाँवों में जन्नत मिला है  सदा  माँ के पाँवों में।। गाँव में  मिलता बहुत लोगों का  प्यार, शहर आते बहुत कुछ खो दिया मेरे यार। चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार, गाँव की याद आती है बहुत मेरे यार।। #  <script data-ad-client="ca-pub-6937823604682678" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>