लेख -- प्रेम से अमरत्व की प्राप्ति
प्रेम का अर्थ तो हमेशा समर्पण है।वो भी किसी के साथ निस्वार्थ भाव के साथ किया गया समर्पण ही प्रेम की परिभाषा है।चाहे वो प्रेम भगवान के प्रति हो,या रामायण में राम,लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न का भ्रातृ प्रेम हो,या मातृभूमि के प्रति हमारे सेना का प्रेम हो।सच्ची लगन,सच्ची सेवा ही प्रेम की नींव हैं।लेकिन आज के समाज के कुछेक जन ने प्रेम की परिभाषा को धूमिल कर दिया है।प्रेम तो सदा लेता नहीं है।यह हमेशा कुछ न कुछ देता है।प्रेम शब्द ही अथाह सागर है।जितना डूबोगे डूबते चले जाओगे।अब ध्यान देने योग्य बात है कि अगर आपके हाथ मे हीरा है तो हीरा की चमक पहचानने की जरूरत है।और हां जरूरत है,हीरा को कैसे बचा कर रखें।ठीक उसी तरह अपनी सभ्यता,संस्कृति,और अपनी विरासत को कैसे बचाकर रखें।वो आपके हाथों मे है।चाहे तो हीरा की तरह संभालकर रखो।या फिर कहीं खो दो।
--- आपका छोटा कलमकार गौरव झा

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