ग़ज़ल/रचनाकार:-- गौरव झा
मैं ज्वाला हूं, हमेशा जलता रहूंगा,
जो सच होगा,वहीं मैं कहता रहूंगा,
अंधेरों से हमें कोई गिला नहीं,ए गौरव
मैं समंदर हूं,नदियों को लेकर चलता रहूंगा।
मैं भटकता रहा कई वर्षो से,सच की तलाश में,
जीने लगा था लोगों के बीच जैसे हो जिंदा लाश,
पता नहीं ठिकाने पर चला था घर से सवेरे-सवेरे
मंज़िल तक पहुंचते-पहुंचते ज़रा सी देर हो गई।
अपनी कलम से रोज़ कुछ नया गढ़ता हूं,गौरव
कुछ अपने कुछ लोगों की वेदना लिखता हूं,
शाम के वक्त जब बैठता हूं, दोस्तों के साथ,
अंतर्रात्मा से बुने गीत, जुबां से गुनगुनाता हूं।
शहर में कैसे रहते लोग, बहुत भीड़ दिखती है,
हर तरफ़,हर गली में हैवानों का सिर दिखती है,
आभास हो रहा है,शायद निशा में सब सो गए हैं,
आकाश देखा चांद,तारे भी मेरे साथ जाग रहें हैं।
वक्त कुछ यूं चला कि सारे पत्ते पेड़ से टूट गए,
जो टुकड़ा था अपने ज़िगर का,कुछ वही छोड़ गए,
पता नहीं क्या खता हुई मुझसे,न जाने क्यूं ए ख़ुदा। पेड़ के सारे पत्ते एक साथ,बिनकहे रिश्ता तोड़ गए।
कुछ अच्छे,कुछ धूर्त दोस्त भी मिले बहुत इस जमाने में, खफा जब भी हुई वह,कई साल-महीने लगे उसे मनाने में, अच्छी सोच रखता हूं,उसे मैं कैसे यकीन दिला पाऊंगा,गौरव यूं लगता है मुझे लगेंगे,कई साल-कई महीने उसे समझाने में।।।

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