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विपरित माहौल में भी जीना सीखें।

 Writer//Poet// journalist Gaurav Jha

मैं ज्वाला हूं, हमेशा जलता रहूंगा,

जो सच है,वहीं मैं कहता रहूंगा,

अंधेरों से हमें कोई गिला नहीं ए गौरव

मैं समंदर हूं, नदियों को लेकर चलता रहूंगा।




जब भी हम समाज  अथवा देश के लोगों के बारे में हम  सोचते हैं कि सभी व्यक्ति हमारे जैसा हो।हमारी सोच का हो,जो हमेशा मेरे साथ  रहे।जो हमेशा सकारात्मक सोच के साथ मेरे साथ रहे। लेकिन ऐसा संभव नहीं हैं।जिस प्रकार ईश्वर ने प्रकृति के साथ-साथ फल-फूल,वृक्ष, पशु-पक्षी, छोटे-छोटे कीट-पतंगों, सुंदर पंखों से फूल को मुस्कुराने पर विवश करने वाली तितली को बनाया।उसी आधार पर परमात्मा ने सभी के रंग-रूप, जीवन-शैली,और सभी मनुष्यों, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के अलग-अलग गुण प्रतिभा उसके अंदर विकसित किया। आख़िर इंसानों की सोच में भिन्नता क्यों होती है?अकसर इस तरह की ख्याल हमारे मस्तिष्क में प्राय: चलते रहते हैं।अकसर कभी-कभी मनुष्य के सोच में भिन्नता का रहस्य पता चलना बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ बुद्धिजीवियों से सुनते आए हैं कि अगर मनुष्य की सोच एक जैसी हो जाएगी तो यह दुनिया नहीं चलेगी। यथार्थ उनका कथन सत्य भी है कि दुनिया नहीं चलेगी। लेकिन हरेक मनुष्यों के अंदर सकारात्मक सोच हो जाएं,तो किसी भी व्यक्ति से कभी भी मार-पीट, लड़ाई-झगड़ा, झंझावात व इतने ज़ुल्म,अत्याचार नहीं होगा।लोग आसानी पूर्वक समाज में सुखीपूर्वक, शांतिपूर्ण तरीके से जीवन-यापन करेंगें।दर असल हम कितना भी कोशिश कर लें।जग के सोच को बदल नहीं सकते हैं। इससे बेहद अच्छा तरीक़ा है कि या तो आप ख़ुद बदल जाएं।सभी दोस्तों के बीच  रहकर भी आप अच्छा बन सकते हैं।उनके हरेक प्रकार के कार्यों में साथ दें।जब तुम मित्रता के सूत्रों में बंध चुके हो।तब तो दोस्त चाहे अच्छा करें या बुरा करें।उसके साथ हमेशा रहों।यह घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक है। लेकिन मैं ख़ुद कहना चाहूंगा कि मैं अपने कक्षा में अलग सोच रखने वाले विद्यार्थियों में एक था।मेरे कुछ अलग नियम,कर्त्तव्य, सिद्धांत था।मुझ में एक कमी थी कि दोस्तों के ग़लत कार्यो मैं कभी साथ नहीं देता था। लेकिन सच्चाई के रास्तों में सदा क़दम से क़दम मिलाकर उसके साथ खड़ा रहता है।इसका भी एक कई कारण थे। उसमें से एक कारण था कि बचपन से ही  मैं शांत स्वभाव का व्यक्ति था। मुझे किसी के मुंह से ग़लत चीज़ सुनते ही मुझे गुस्सा आ जाता था।वहीं जब मैं कांलेज में आया। मैंने अपने गुस्सा पर काबू करना सीख लिया था। मुझे कोई व्यक्ति या मित्र ग़लत बात भी कुछ कहता थे, मुझे गुस्सा नहीं आता था।इसका एक ही कारण था कि मैं अपने ऊपर संयम प्राप्त कर लिया था।उस वक्त मेरे सामने जैसी परिस्थिति थी,उसी के अनुरूप ढ़ालना अपने को उचित समझा।दर असल वक्त के साथ समझौता करना मैंने कभी नहीं सीखा।किसी भी प्रकार की समस्याएं, चुनौतियां से निपटना सीखा। मैं मानता हूं कि जब आप अपने को भौतिकवादी व फैैशनवादी दुनिया से अपने आपको अलग रखेंगे। आपको किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।बशर्ते अपनी इच्छाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगें।अब आप यह कहें गे कि क्या मानव अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर सकता है?इस पर मैं अवश्य कहना चाहूंगा कि आप अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं पा सकते। लेकिन अपनी इच्छाओं को सीमित अवश्य कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर समझाने का प्रयास करता हूं जब आप बाजार जाते हैं।बाजार की चकाचौंध दुनिया देखकर मन विचलित हो जाता है। वाकई मन में कई तरह के प्रश्न हिलौरें ले रहे होते हैं।उस वक्त सिर्फ आप कल्पना करें कि उस वक्त आपके जेब में सिर्फ़ 100रूपए  हैं, लेकिन बाजार में उपलब्ध रंग-बिरंगे समान देखकर मन आपका आकर्षित होता होगा।आप ज़रा एक मिनट के लिए सोचें कि के आप बाजार की सारी वस्तुएं तो 100 रूपए में नहीं खरीद सकते।ले बल्कि एक चीज़ अवश्य कर सकते हैं कि आप अत्यधिक इच्छानुसार वस्तुओं को नहीं खरीद सकते। निश्चित तौर पर वहां पर केवल जरूरत भर समान खरीद सकते हैं।कम पैसा रहते हुए भी आप बेहतर समान या अत्यधिक आवश्यकता की सामग्री खरीद सकते हो। इसलिए मैंने पहले कहा था कि अपनी इच्छाओं को सीमित करना पड़ेगा।                     अक्सर जब भी कालेजों में किसी भी प्रकार का आयोजन या चर्चाएं होती थी। उसमें एक-दो मित्र मुझे कहते थे कि मुझे पता है कि आपके पास समय का अभाव होगा। लेकिन मेरा हृदय बिल्कुल साफ़ था।उसे मैं अपनी व्यस्तता का क्या राज बताता?बस! अनायास मेरे मुख से कुछ वाक्य निकलता कि--  मित्र, तुम्हारे लिए हर-वक्त, हर-समय मेरे पास समय है। लेकिन उसे समझाने का मतलब था, ख़ुद को उसके सामने बेवकूफ साबित करना।जी,हां! कालेजों के मित्र भी एक से बढ़कर एक नमूने थे। लेकिन एक चीज़ अवश्य कहना चाहूंगा कि सब एक जैसे नहीं थे। कुछ उसमें अच्छे भी थे।  प्राय: मित्र हमें अक्सर  आप  ख़ुद को पहचान कर सफ़र में अकेले आगे बढ़े......................(शेष आगे)

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                            ✍️  लेखक-- गौरव झा

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