कवि//लेखक//पत्रकार गौरव झा
"भले सच का जमाना नहीं रहा गौरव,रहता हूं साथ सच के झूठी बाज़ार लगाने वाले हमसे रहना ज़रा तुम बच के !!"
कविता -- मैं तुझे जगाने आया हूं।
तुम कब तक मेरे राह में कांटा बुनने आओगे,ए दोस्त
जिस पथ में बढ़ोगे,पहले मेरे ही पदचिन्हों को तुम पाओगे।
चाहे तुम जिस अंजान राह में पथ भूलोगे,
शायद मेरी ही कुछ बातें को ज़रा याद कर लेना
मैं ही तुझे कांटें भरी राह में पथ दिखाने आऊंगा।
मैं हूं जग का सूरज,तेरे जीवन का अंधेरा मिटाने आऊंगा।
तेरा झूठा मन पर सच का चादर ओढ़ाने मैं आऊंगा,
जब तेरा मन विचलित होगा, तब-तब तुझे जगाऊंगा।
तुम कब तक मेरे राह में कांटा बुनने आओगे,ए दोस्त! जिस पथ में बढ़ोगे,पहले मेरे ही पदचिन्हों को तुम पाओगे
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