कविता:-- ज़िंदगी // कवि//शायर//पत्रकार गौरव झा
आईना में झांककर तसल्ली से चहरा देखता है कोई,
भर-रात सड़क पर ज़िंदगी गुजारता है कोई-कोई
ए दोस्त!आराम की ज़िन्दगी जीता नहीं दुनिया में कोई,
दो-जूम रोटी खाकर सड़क किनारे सोता है कोई-कोई
समझते हो तुम जिसे अपना मसीहा, नहीं है वह कोई,
उजालों की तलाश में सफ़र में भटकता है कोई-कोई।
अंज़ाम से हैं डरते वो,जिसका सपना हो ना कोई,गौरव
ख़ुदा ने दी जिसे हुनर,निशा में जला करता है कोई-कोई।
होती नहीं मुहब्बत के सिवा कुछ भी,जानता है कोई,
अटल,दिनकर,कलाम के पथ पर चलता है कोई-कोई।
मासूम काँच टूटता है अक्सर,चोट देता उसे जब है कोई,
महान् व्यक्तित्वों के पदचिन्हों को पहचानता है कोई-कोई।
झूठ के बाजारों में होता है मुनाफा,भागते यहां सब कोई,
उजाला बनकर दुनिया में, अंधेरों को मिटाता है कोई-कोई।

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