कविता//स्त्रियाँ एक मोम

स्त्रियाँ एक मोम
जैसी होती हैं,
हर बात पे नाराज़ होना,
गुस्सा हो जाना,
  होता है उसका स्वभाव
गुण,
मन से चंचल, पवित्र
जो अंतिम साँस तक,
रिश्तों को सहेजना,सँभालना
जानती है,
हर स्त्री पाना चाहती है प्रेम,
जो उसे हर-क्षण, हर-पल
ख़ुशी दें,
आख़िरी साँस तक वो
रखती है एक उम्मीद
जो उसे दिल से समझे,
उसकी भावनाओं को समझे,
उसे जाने,उसे पहचाने
स्त्रियाँ होती है एक मोम
जैसी जो बात-बात पे
पिघल जाती है,
कभी हँसती है जैसे रात की
चाँदनी खिलखिला कर
हँस रही हो,
रोती है कभी तो आती है
सुनामी,जो समंदर की
लहरों में उथल-पुथल
मचाती है,हल-चल होती
है पानी में भी,
स्त्रियां घर की रौनकता है,
वहीं दुनिया की शक्ति है,
जिस पर समस्त सृष्टि
टिकी हुई है,
सृष्टि का आधार है ये नारी,
तकलीफ़ देता रिश्ता वो,
सहेजती है,सँभालती है,
ढँकती है,बाँधती है,
उम्मीद के आख़िरी छोर तक,
बस!याद रखना जिस दिन
वह मुँह मोड़ेगी,
समझ लेना होगा संपूर्ण विनाश,
होगें आप बर्बाद,
बनती है कभी वो एक दीपक की बाती
जो प्रकाश फैलाता है चारों ओर,
ख़ुद कभी बनती है प्रेरणा,
स्त्री होती है मोम जैसी.........
                   ✍️✍️ kavi Gaurav Jha

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