ग़ज़ल//कवि गौरव झा
ख़ुद को वो बहुत औरों से होशियार समझता है,
ज़माना है दिलों में जिसके उसे बीमार समझता है।
गुनाह करता सरेआम,ख़ुद को वफादार समझता है,
सर पे ताज पहनकर सबसे वो जमींदार समझता है।
बिक रहा ईमान ज़माने में,सबको वो यार समझता है,
उसकी क़ातिल निगाह ख़ुद को समझदार समझता है।
ताकता है शहर के आईनों में,वो वफादार समझता है,
ज़माना है दिलों में जिसके उसे वो बीमार समझता है।
जख्म खाकर अंधेरों में वो ख़ुद को जानदार समझता है,
अंधेरा मिटाने वाले को वो सरेआम तलबगार समझता है।
ख़ुद को वो बहुत औरों से होशियार समझता है,
ज़माना है दिलों में जिसके उसे बीमार समझता है।

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