कविता// माया-मोह

एक इंसान कितना भी हो
बहादुर,शुरवीर और शक्तिशाली,
लेकिन माया-मोह से इस
दुनिया में कोई परे नहीं,
दिखता है जो जैसा इंसान,
आज वैसा होता नहीं,
जो वास्तव में जैसा दिखता
है,उसे न जाना  जाता है,
और न ठीक से पहचाना जाता है
यह भी एक सच्चाई है,
उलझे हैं इस आपाधापी जीवन में सभी,
हर मनुष्य अपने-अपने कामों में,
धरती पर जो लोग
लेकिन जिंदा तो है पर,
इस धरती पे उनका अस्तित्व कुछ भी नहीं,
बाजारों में मनुष्य से मुलाकातें
तो हर रोज़ मुझे होती हैं,
लेकिन मनुष्यता कुछ के अंदर
मुझे दिखती है,
खो चुके हैं सब इस ज़िंदगी के मेले में,
जहाँ भीड़ तो दिखती है,
लेकिन सब अनभिज्ञ हैं ख़ुद से,
खोजते हैं दूसरों में ज़िंदगी,
जीवन जीना उतना आसान नहीं,
अपनत्व की डोर न हो जहाँ,
वहाँ किसी से किसी को पहचान नहीं।

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