ग़ज़ल:--
जनसंख्या वृद्धि हर दिन बढ़ता जा रहा,
बोझ से अपनी धरती अब दबता जा रहा।
दरिंदगी रूक नहीं रही है अब कहीं मुल्क में,
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ सर पार होता जा रहा।
ग़ज़ब दौर है राजनीति का, ग़ज़ब के हैं नेता अब
पिछले वायदे भूलकर नए अब वादें करते जा रहे।
सब बैठे थे छुपाकर अपना चहरा उस महफ़िल में,
आदमी को झूठा भरोसा दिलाकर ये छलते जा रहे।
कर न पाए इंतज़ाम अभी तक मुल्क में रोज़गार का,
डिग्रियां लेकर युवा दफ्तर के रोज़ चक्कर लगाते जा रहे।
उठता जा रहा है अब आम जनता का भरोसा अब यहाँ,
राजनीति के पेंच ख़ुद वो भी अब देखों समझते जा रहे।
मुमकिन नहीं है क्या "गौरव" इसका निवारण धरा पे,
झूठे बयानबाज़ी करके वो भी ख़ुद-ब-ख़ुद लड़ते जा रहे

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