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ग़ज़ल

चलो अब मुल्क को राह दिखाया जाए,
भ्रष्टों का इस ज़हां में पर्दा उठाया जाए,

ज़माना नहीं है अब चुप रहने का बेशक,
शातिरों को ज़रा नेक राह दिखाया जाए।

मसीहा बने बैठे हैं जो अपने इस देश में,
उनसे एक-एक हाथ ज़रा अब लड़ा जाए।

बना रखे हैं लुटकर जो मकां अपनी-अपनी,
उनसे अपनी हक़ की बात अब किया जाए।

भर रहें ग़रीबों के पैसों से जो अपनी तिजोरी,
उसे यक़ीनन इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाए।।

जो मकां में सदियों से है अभी तक अंधेरा,
उन घरों में अब इक चिराग़  जलाया जाए।।

तमाशा बने बैठे हैं जो अपने इस मुल्क में ,
आँख ज़रा गद्दारों से एक बार मिलाया जाए।

गुमराह हैं सदियों से जो अपने घरों में अब तक,
जुबां उनके अपनी हक़ के लिए खुलवाया जाए।।

मदहोश हैं जो अंधी सियासत के आगे अब भी,
चश्मा ज़रा सच्चाई का अब उन्हें पहनाया जाए।।

तड़पते हैं,सोते जो फुट-पाथों पे अब भी ज़माने में,
उनकी भी सोयी आत्मा को भी अब जगाया जाए।।

बेच रहें जो सरेआम अब तक  बाजारों में झूठ,
ऐसे रहनुमाओं पर से अब ज़रा पर्दा उठाया जाए।।

अंधियारे हैं  जिस मकां में अब तक ए गौरव,
इक-इक दीपक उन घरों में अब जलाया जाए।।

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