कविता : शब्दों की स्यायी

।        GAURAV JHA
  ( Journalist, writer & Columnist )

 शब्द एक नहीं
अनंत है यह,
काली स्यायी से
उखेरते हैं जब निशा में
काग़ज़ पर,
कोई गति दुनिया में है क्या?
जो शब्दों की गति
सहज और सुलभ तरीके से
पहचान सके, गिन सके
गति है इसकी अनंत
शायद सांय-सांय बह रही
ठंडी हवाओं से भी तेज़
 रूह के स्पर्श मात्र से
होती है जो हलचल,
अजीबो-गरीब बौखलाहट
हाथों और समूचे शरीर के
हर इक कोने को कँप-कँपाती हुई,
शब्द ही तो है,
मसलन शब्द नहीं है बल्कि
इसका आवागमन  है बहोत दूर तलक,
शब्द में एक सुगंध है,गंध है
एक गुलाब की फूल की पंखुड़ियों
की तरह,
मन-मोह लेती पथिकों का,
गुजरते हैं जो उस राह से,
मन प्रफुल्लित हो जाता है,
खिल उठता है पथिकों का चहरा
शब्द ही है इसमें भी स्पर्श है,
गति होती है शब्दों का भी,
मन की गति से भी शायद तेज़
शब्द एक नहीं 
बल्कि अनंत हैं
 हृदय की धमनियों को स्पर्श करती है
वो क्या है?
वह केवल शब्द ही तो है,
मन की गति जितना दूर तलक,
जाती है उतनी तेज,
गति है शब्दों की,
भाव जब-जब शब्दों के
समंदर में हिलोरे लेते हैं,
गढ़ता है कोई जब काली स्याही से,
उखेरते हैं कागज़ पर निशा में,
कुछ भावों,हृदय की धड़कन की अभिव्यक्ति को,
सहसा शब्द मौन है शांत है,
यह जीवन के विभिन्न आयामों को,
महसूस अथवा स्पर्श करता है,
खामोशी से किसी चीज़ को
पल-भर में महसूस कर लें,
सुन लें एक सुई के गिरने
की आवाज़ों को फर्श पर,
काली रोशनाई से गढ़ता जाएं
रात-रात भर,
वह क्या है?
वह केवल शब्द ही तो है!!

--------@ Gaurav Jha

Comments