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Showing posts from December, 2018

कविता//तुझे जगाने आया हूं//गौरव झा

                               Writer/Poet Gaurav Jha        कविता-- तुझे जगाने आया हूं। तुम  कब तक मेरे राह में कांटा बुनने आओगे,ए दोस्त जिस पथ में बढ़ोगे,पहले मेरे ही पदचिन्हों को तुम पाओगे। चाहे तुम जिस अंजान राह में पथ भूलोगे,                                          शायद  ही कुछ बातें को ज़रा याद कर लेना                    मैं  ही तुझे कांटें भरी राह में पथ दिखाने आऊंगा । मैं हूं जग का सूरज,तेरे जीवन का अंधेरा मिटाने आऊंगा ।  तेरा  झूठा मन पर सच का चादर ओढ़ाने तेरे घर आऊंगा, जब तेरा मन विचलित होगा, तब-तब तुझे जगाऊंगा। तुम कब तक मेरे राह में कांटा बुनने आओगे,ए दोस्त।  जिस पथ में बढ़ोगे,पहले मेरे ही पदचिन्हों को तुम पाओगे                 ...

कविता//मैं तुझे जगाने आया हूं....।

    कवि//लेखक//पत्रकार गौरव झा             "भले सच का जमाना नहीं रहा गौरव,रहता हूं साथ सच के    झूठी बाज़ार लगाने वाले हमसे रहना  ज़रा तुम बच के !!"                                                             कविता -- मैं तुझे जगाने आया हूं।                  तुम  कब तक मेरे राह में कांटा बुनने आओगे,ए दोस्त जिस पथ में बढ़ोगे,पहले मेरे ही पदचिन्हों को तुम पाओगे। चाहे तुम जिस अंजान राह में पथ भूलोगे, शायद मेरी ही कुछ बातें को ज़रा याद कर लेना मैं ही तुझे कांटें भरी राह में पथ दिखाने आऊंगा। मैं हूं जग का सूरज,तेरे जीवन का अंधेरा मिटाने आऊंगा। तेरा झूठा मन पर सच का चादर ओढ़ाने  मैं आऊंगा, जब तेरा मन विचलित होगा, तब-तब तुझे जगाऊंगा। तुम कब तक मेरे राह में कांटा बुनने आओगे,ए दोस्त!    ...

विपरित माहौल में भी जीना सीखें।

 Writer//Poet// journalist Gaurav Jha मैं ज्वाला हूं, हमेशा जलता रहूंगा, जो सच है,वहीं मैं कहता रहूंगा, अंधेरों से हमें कोई गिला नहीं ए गौरव मैं समंदर हूं, नदियों को लेकर चलता रहूंगा। जब भी हम समाज  अथवा देश के लोगों के बारे में हम  सोचते हैं कि सभी व्यक्ति हमारे जैसा हो।हमारी सोच का हो,जो हमेशा मेरे साथ  रहे।जो हमेशा सकारात्मक सोच के साथ मेरे साथ रहे। लेकिन ऐसा संभव नहीं हैं।जिस प्रकार ईश्वर ने प्रकृति के साथ-साथ फल-फूल,वृक्ष, पशु-पक्षी, छोटे-छोटे कीट-पतंगों, सुंदर पंखों से फूल को मुस्कुराने पर विवश करने वाली तितली को बनाया।उसी आधार पर परमात्मा ने सभी के रंग-रूप, जीवन-शैली,और सभी मनुष्यों, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के अलग-अलग गुण प्रतिभा उसके अंदर विकसित किया। आख़िर इंसानों की सोच में भिन्नता क्यों होती है?अकसर इस तरह की ख्याल हमारे मस्तिष्क में प्राय: चलते रहते हैं।अकसर कभी-कभी मनुष्य के सोच में भिन्नता का रहस्य पता चलना बहुत ही मुश्किल होता है। लेकिन कभी-कभी कुछ बुद्धिजीवियों से सुनते आए हैं कि अगर मनुष्य की सोच एक जैसी हो जाएगी तो यह दुनिया नहीं...