सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार-आंदोलन के जनक कहे जाने वाले पद्म विभूषण से अलंकृत महान व्यक्त्वि डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे। उन्होंने सिर्फ़ महात्मा गाँधी जी के सपने को पूरा नहीं किया। बल्कि स्कैवेंजरों के मानवाधिकार और सम्मान दिलाने के लिए जीवन भर संघर्षरत रहा और अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। अक्सर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कहा करते थे कि -------------
" शायद मेरा पुनर्जन्म नहीं हो,किंतु यदि ऐसा होता है, तब मेरी इच्छा है कि मेरा जन्म स्कैवेंजरों के परिवार में हो, जिससे मैं सर पर मैला ढ़ोने के अमानवीय, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तथा घृणित कार्य से उन्हें मुक्ति दिला सकूँ"
कहीं न कहीं पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी महात्मा गाँधी जी के विचारों से प्रभावित थे,और उनके विचारों को सीने में लेकर चला और लाखों स्कैवेंजरों, 'अस्पृश्यों' को मानवाधिकार और सम्मान दिलाने के लिए महात्मा गाँधी के अधूरे सपने को पूरा किया। दर असल पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का जन्म 2 अप्रैल, 1943 को बिहार के वैशाली जिले के रामपुर के बघेल गांव में एक मैथिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वैसे काफ़ी अरसे से यह समुदाय ने अनेक पीढ़ियों से भारत को प्रसिद्ध विचारक, महान विभूतियाँ, शिक्षाविद, कवि, लेखक आदि दिए हैं, जो समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है।
डॉ. विंदेश्वर पाठक जी, कॉलेज में अध्ययन के लिए पटना आए और समाज शास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त किया। सन् 1964 का समय था। वे गाँव लौटने के बाद वे माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक बन गए। उन्हें शिक्षण कार्य करने में रुचि था और पसंद भी। उस दौर में, वे शिक्षक के रूप में प्रति माह सिर्फ 100 रुपए पर शिक्षण कार्य कर रहे थे, जिसके बाद में उन्हें छोड़ दिया। हालांकि उसके बाद डॉ. विंदेश्वर पाठक जी निरंतर संघर्ष करते रहें।
हालांकि हर महान व्यक्तियों के जीवन में उतार-चढ़ाव निरंतर चलता रहता है। लेकिन उन सबकी सोच,उनके संघर्ष, काम के प्रति निष्ठा उसे महान बनाता है। उसके बाद बिहार विद्युत-बोर्ड में कार्यरत एक पुराने मित्र की सहायता से वे 5 रुपए प्रतिदिन की दर से दैनिक वेतनभोगी के तौर पर पतरातू थर्मल पॉवर स्टेशन में कार्य करने लगे। लगभग एक वर्ष तक उन्होंने उसमें काम किया।लेकिन उनके मन में विचार आने लगा कि उच्च वर्ग के परिवार में जन्म लेना सौभाग्य की बात है। उच्च वर्ग में जन्म लेने की सार्थकता इसी में है कि कुछ अलग हटकर किया जाएँ। क्योंकि उनके मन में कुछ बड़ा बदलाव अथवा परिवर्तन लाने का विचार आने लगा था। समाज कल्याण, समाज-सेवा करने का संकल्प लेकर अपनी एक अलग पहचान और स्थान भी बनाने का विचार उनके अंतर्मन में आया। लेकिन ऐसे सपने देखना, बड़ा सोच रखना कोई विरला ही सपने को हकीकत में बदलने की क्षमता रख सकता है। क्योंकि ऐसे सपने को पूरा होने में काफी वक्त लगता है। वैसे स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है --------------------------
"जितना बड़ा संघर्ष होगा,जीत उतनी ही शानदार होगी।"
इसके बाद पद्म विभूषण से अलंकृत डॉ. विंदेश्वर पाठक के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब वे बिहार गाँधी शताब्दी समारोह समिति में उन्होंने अवैतनिक रूप से हिंदी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने का काम शुरू किया। इसके बाद कुछ समय के बाद उनको पुन: स्थापना- शताब्दी समारोह समिति में 200 रुपए प्रतिमाह पर उनकी नौकरी लग गई। इस स्थापना - शताब्दी समारोह का स्थापना का उद्देश्य था समाज के निम्न तबके के या अछूत लोग, जो हाथों से मानव-मल की सफाई करते थे, उनके मानवाधिकार और सम्मान के लिए निरंतर प्रयासरत रहना। उसमें पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का स्वच्छता व्यवस्था के लिए कोई ठोस निदान ढूँढ़ना। इस प्रकार का कार्य उन्हें दिया गया था।
साथ ही, ऐसे स्कैवेंजरों, अस्पृश्यों या अछूत लोग, जो कहीं न कहीं मैला ढ़ोने की प्रथा से समाज में पीड़ित थे। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाया जाएँ। हालांकि समाज-सुधारक, स्वच्छता के 'जनक' कहे जाने वाले पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक का परवरिश एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
उन दिनों समाज में निम्न वर्ग के लोगों के साथ व्यवहार भी अनादर पूर्ण होता था। छूता - छूत की प्रथा भी भयावह रूप ले रखी थी। इसलिए अस्पृश्य लोग यानि अछूत या निम्न तबक़े के लोग जो मैला ढ़ोने की प्रथा से पीड़ित थे।अमूमन समाज सुधारक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी को बाल्यवस्था से उनके मन में यह बात बैठा दी गयी थी कि किसी अछूत जाति को छूना नहीं है, किसी के हाथ का पानी नहीं पीना है या किसी वंचित या अछूत तबक़े के लोगों के घर पर पका खाना नहीं खाना है। हालांकि एक बार इस चीज का विरोध करते हुए उन्होंने एक अस्पृश्य का स्पर्श कर लिया तो उनकी दादी ने सबके सामने उन्हें गोबर और बालू निगलने के लिए कहा गया और गंगाजल पीने को दिया गया।
दर असल, 1970 का दशक था। भारत में खुले में शौच की समस्या बहुत गंभीर थी। गंदगी, बीमारियां और सामाजिक भेदभाव खासकर अस्पृश्यों यानि अछूत जाति के लोगों के सिर पर मैला ढोने की प्रथा समाज में प्रबल थी और बड़ी चुनौती भी।
ऐसे समय में एक महान शख्सियत, सुलभ के 'जनक', स्वच्छता के प्रणेता, समाज-सुधारक पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने का संकल्प लिया। और सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की। दूसरी तरफ़" किसी भी संस्थानों का निर्माण लक्ष्य, विश्वास, संकल्प, सामाजिक परंपराओं,संस्कृतियों,सिद्धांतों और विचारों को आगे निरंतर ले जाने के लिए होता है। आज के दौर और उस समय के दौर में जमीन और आसमान का अंतर था। उस दौर में जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा और मैला ढोने की प्रथा चरम सीमा पर थी। विकराल और भयावह रूप ले रखी थी।
हालांकि मकान हमेशा ईंट, बालू और छड़ इत्यादि से तैयार होता है। संरचनाओं का निर्माण होता है, जो समयानुसार नष्ट हो जाते हैं,लेकिन विचार और विश्वास कभी समाप्त नहीं होते हैं।भारत की संस्कृति अति प्राचीन है।वेद,उपनिषद,ग्रंथ आदि भारतीय संस्कृति के नींव है,जिसमें भारतीय दर्शन,ज्ञान-विज्ञान,विश्वास और विचार सम्मिलित हैं और आज भी यह भारतीय संस्कृति के मूल आधार है।विचार,विश्वास,संकल्प, अनवरत स्थायी और शाश्वत होते हैं और हर चीज़ समाप्त हो जाने पर भी यह विद्यमान रहते हैं।विचार और विश्वास कभी नष्ट नहीं होते हैं।
पिछले लगभग चार दशक से पद्म विभूषण,समाज-सुधारक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी द्वारा 1970 ई. में स्थापित सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनइजेशन स्वच्छता अभियान तथा मानव अपशिष्ट के उपचार और निपटान की तकनीक के विकास के क्षेत्र में निरंतर कार्य कर रहा है। समाज के वंचित वर्ग, दलित तबक़े के लोग, जो छूआ-छूत और सर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा में जकड़े हुए थे।इस तरह की कुप्रथा को समाप्त करने का प्रयास सुलभ ने किया है, जो समाज में सुधार लाने का एक महत्वपूर्ण कार्य है। मानव अपशिष्ट के उपचार के लिए सुलभ इंटरनेशनल ने कई तकनीक विकसित किया है। मानव-मल पर आधारित 'बायोगैस प्लांट' को सुलभ ने तकनीक विकसित करके दुनिया को दिखाया है। मानव अपशिष्ट का रीसाइकिल (Recycle) करके खाद के रूप में प्रयोग होता है। और उससे निकलने वाली गैस का उपयोग भोजन पकाने, गैस बत्ती जलाने और सर्दियों के मौसम में अलाव के रूप में प्रयोग किया जाता है। दरअसल,सुलभ ने कई तकनीक विकसित किया है, जिससे शौचालय में प्रयोग जल का यंत्र अथवा तकनीक के माध्यम से जल का शुद्धिकरण किया जाता है। हालांकि अब सुलभ की नई तकनीक आवासीय कॉलोनियों,ऊँची इमारतों, कॉलेजों, छात्रावासों, होटलों, अस्पतालों इत्यादि के लिए सफल साबित होती दिख रही है।
अमूमन सुलभ का उद्देश्य सिर्फ़ स्कैवेंजरों के मानवाधिकार एवं सम्मान दिलाने के क्षेत्र में कार्य करना नहीं, वरन् उनके सामाजिक समीकरण को सुनिश्चित करना, गरीबी का उन्मूलन तथा पर्यावरण से संबंधित कार्य जैसे प्रदूषण बचाव के क्षेत्र में कार्य करना है। स्वच्छता, स्वास्थ्य और साफ- सफाई के कार्य को बढ़ावा देना सुलभ का एकमात्र लक्ष्य सदा से ही रहा है। पिछले 40 से 50 वर्षो के दरमियान सुलभ ने बड़ी संख्या में मानव मल को हाथ से साफ करने एवं अछूत तबक़े के लोग, जो कभी अपने सर पर मैला ढ़ोने का घृणित और अपमान जनक कार्य करते थे। उससे लाखों स्कैवेंजरों को निजात दिलाई।
पद्म विभूषण से अलंकृत समाज-सुधारक, स्वच्छता के जनक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी ने स्वयं -सेवी सामाजिक संगठन की स्थापना की थी,जो सरकार और लोग, दोनों के लिए मान्य हो। हालांकि आरंभिक दौर में संस्था अथवा संगठन का नाम पड़ा ---- सुलभ - स्वच्छ - शौचालय - प्रशिक्षण - संस्थान। लेकिन बाद में इस संगठन का नाम 'सुलभ शौचालय संस्थान' में परिवर्तित हो गया। लेकिन समयानुसार इस संस्था का नाम 'सुलभ इंटरनेशनल' के नाम से जाना जाने लगा। अब इसका नाम 'सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन ' है। वहीं दूसरी तरफ 'सुलभ इंटरनेशनल' के गठन के बाद सर्वप्रथम बिहार के आरा नगर निगम क्षेत्र में प्रदर्शन के लिए दो शौचालयों का निर्माण किया गया। इस तरह के कार्य को देखने के बाद नगर निगम के अध्यक्ष ने सुलभ का प्रस्ताव सहज रूप से स्वीकार कर लिया। शौचालय देखकर वे उस समय बहुत खुश हुए। और कहा कि इस कार्य से राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी के सपने साकार हुए हैं।
हालांकि उस दौर में, दुःख की बात यह थी कि उससे पहले दर असल, सरकारी इंजीनियर को दो ही तकनीक के बारे में जानकारी थी --- नाली- व्यवस्था (सीवरेज), और सेप्टिक टैंक। सुलभ की (पोर- फ्लश - ट्वाॅयलेट) की नई तकनीक को स्वीकार करने को वे तैयार नहीं थे। सुलभ के प्रस्ताव पर विचार करने में उन्होंने तीन वर्ष से अधिक समय लगा दिया। इस प्रकार जमीनी स्तर पर बिहार के आरा -- नगर निगम से ही 'सुलभ स्वच्छता आंदोलन' का कार्य की शुरुआत हुई। हालांकि उस द़ौर में आरा के मूल निवासी इस तरह की नई तकनीक से अनभिज्ञ थे। पद्म विभूषण, समाज-सुधारक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी ने घर-घर जाकर स्कैवेंजरो द्वारा साफ किए हुए बाल्टी वाली शौच-व्यवस्था से उत्पन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में जागरुक किया।और हर जगह जन जागृति फैलाई। लोगों को नई तकनीक से उन्होंने अवगत कराया। धीरे-धीरे लोगों ने इस तकनीक के बारे में जानने लगे और 'सुलभ स्वच्छता आंदोलन' की शुरुआत आरा जैसे छोटे शहर से शुरु होकर धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय फलक पर सुलभ इंटरनेशनल ने स्वच्छता, स्वास्थ्य, साफ-सफाई के क्षेत्र में निरंतर कार्य करके अपना परचम लहराया।
वास्तव में, सुलभ का आमतौर पर उद्देश्य खुले में शौच की समस्या खत्म करना था। सस्ती और स्वच्छ शौचालय व्यवस्था उपलब्ध कराना । मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा को ख़त्म करना। स्वच्छता के साथ सामाजिक सम्मान और रोज़गार के अवसर देना। दरअसल सुलभ ने दो गड्ढा यानि कि 'ट्वीन फीट' शौचालय तकनीक विकसित किया, जो कम पानी में काम करती हैं और कम खर्चीली है। इस मॉडल ने गांवों और शहरों में लाखों शौचालय बनवाने में मदद की। इसके अलावा पे-एंड-यूज़ सार्वजनिक शौचालयों की शुरुआत सुलभ ने ही की। जिससे लोग मामूली शुल्क देकर साफ - सुथरे शौचालय का उपयोग कर सके। इससे हजारों महिलाओं और पुरुषों को मैला ढ़ोने की प्रथा से मुक्ति मिली।उन्हें शिक्षा, प्रशिक्षण और रोज़गार के नए अवसर दिए गए। स्वच्छता के प्रति जागरुकता बढ़ी। भारत के कई राज्यों में लाखों शौचालयों का निर्माण हुआ। सुलभ इंटरनेशनल की कहानी केवल शौचालय बनाने की नहीं है,बल्कि यह सम्मान,स्वच्छता और सामाजिक समानता की कहानी है।यह संस्था दिखाती है कि एक व्यक्ति का संकल्प पूरे समाज में बड़ा परिवर्तन का सकता है। एक व्यक्ति का संकल्प, दृढ़ विश्वास, समाज की पीड़ा समझने की बोध, एक व्यक्ति का अथक प्रयास, लाखों लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला दिया। अपनी सोच, अपना अथक प्रयास, काम के प्रति निष्ठा, एक व्यक्ति को उच्च शिखर पर पहुंचा सकता है। कहीं न कहीं समाज के प्रति पद्म विभूषण,समाज-सुधारक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का अथाह प्रेम दिखाई देता है। समाज की पीड़ा, दर्द और वंचित एवं अछूत तबक़े के लोगों की आह अपने सीने में लेकर चला एक आम आदमी महात्मा गाँधी का सिर्फ सपना पूरा नहीं किया बल्कि उनके अथक प्रयास, उनकी दूरदर्शिता सोच ने उन मुक़ाम पर पहुंचा दिया, जिसकी कल्पना भी नहीं किया जा सकता है। वो शख्सियत, स्वच्छता के गांधी, पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी थे। उनका स्वच्छता के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान रहा है!
दरअसल, भारत के 'अस्पृश्य' यानि ( स्कैवेंजर) को कई नामों से आमतौर पर जाना जाता है, जिसमें सबसे सामान्य नाम है- 'मेहतर'। इस देश की विडंबना ही कहा जा सकता है या फिर कुछ और। लेकिन इसका वास्तविक अर्थ होता है------
'राजकुमार या नेता' । वहीं दूसरी तरफ़ पाकिस्तान में, चित्राल - राज्य में शासन करने वाले प्रधान को आमतौर पर कहा जाता है----- 'चित्राल का मेहतर'। हालांकि इस जाति में एक दूसरा नाम
है 'भंगी', जो अपमान जनक या अनादर पूर्ण शब्द है। 'भंगी' शब्द का आशय 'भांग' से है। बहरहाल भंगी शब्द 'भांग' से बना है,जो एक नशीला पदार्थ होता है। यह शब्द उन्हें पीने की आदत की ओर संकेत करता है। 'भंगी' का अर्थ 'टूटा हुआ' भी होता है, जो संस्कृत के 'भञ्ज' धातु में 'इन्' प्रत्यय लगने से बना है। यह उन अस्मृश्य की ओर इंगित करता है जो बाँस काटकर टोकरी, दरी अथवा बाँस से निर्मित साम्रगी बनाते हैं। हालांकि पंजाब में भंगियों को 'चूरा' या 'धाना' कहा जाता है, जो गंदगी चुनने का कार्य करते हैं। पंजाब, उत्तर प्रदेश, और राजस्थान आदि जगहों पर उनका नाम 'वाल्मीकि' या 'लाल बेगी' कहा जाता है। अमूमन ये दो नाम, देश के दो बड़े महात्माओं के हैं, जिनमें से पहले हिंदू एवं दूसरे मुसलमान हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ अन्य जातियाँ भी साफ-सफाई का काम करती है। जैसे 'हेला' , 'हरी', 'भूमाली', 'डोम', 'डुमरा', 'धानुक', 'बाँसफोर', 'मजहबी', 'मुखियार', 'थोती', 'पाके', 'टेल्ली', 'घासी' इत्यादि है। हालांकि नाम चाहे कोई भी हो, ये सभी सामाजिक स्तर पर सबसे नीचे, निम्न तबक़े अथवा अछूत कहे जाते हैं। इन्हें आमतौर पर अस्वच्छ और 'अपवित्र' समाज में माना जाता है।
दर असल स्कैवेंजर एक ऐसा समुदाय है, जिसमें विभिन्न समुदाय के लोग हैं। इनमें से अधिकतर लोगों को अपकृष्ट कार्य करने हेतु बाध्य किया जाता रहा है। हालांकि यह जति अथवा समुदाय, अलग-अलग जातियों के सदस्यों ने आर्थिक लाचारी, गरीबी या जन्म से ही इस व्यवसाय को भिन्न-भिन्न समय अपनाया है।वास्तव में कोई भी मानव इतना क्रूर,निर्दय और अमानवीय नहीं हो सकता जैसा कि इस देश में अस्पृश्यों अथवा स्कैवेंजर को सहना पड़ा है। इसी जातियों के उद्धार, मैला ढ़ोने की प्रथा को समाप्त करने के लिए एक युग पुरुष, स्वच्छता के पुरोधा, सुलभ के 'जनक', समाज-सुधारक ओर कोई नहीं, बल्कि डॉ. विंदेश्वर पाठक जी थे। जो अछूत और निम्न तबक़े के लोगों के अधिकार के लिए,उनके सामाजिक सम्मान की रक्षा के लिए जीवन भर प्रयासरत रहा...........
सुलभ इंटरनेशनल आज के समय में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान रखता है और यह ख्याति प्राप्त संस्था, स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य करने के लिए काफी शुमार नाम है। सुलभ आज केवल एक संस्था अथवा संगठन नहीं, वरन् यह एक आंदोलन है।सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन स्वच्छता,साफ-सफाई,शौचालय निर्माण के क्षेत्र में सतत् प्रयासरत रहा है और सदा से ही समाज-सेवा, राष्ट्र-निर्माण में इस संस्था की अहम भूमिका रही है। वास्तव में, इस संस्था में 50,000 से अधिक स्वयंसेवकों की सतत कार्य शक्ति अनवरत देश के विभिन्न राज्यों में काम कर रही है। यह 25 राज्यों एवं 4 संघीय क्षेत्रों,436 जिलों और 1247 शहरों में लगातार कार्य कर रहा है।
साथ ही यह सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन कई देशों में लगातार कार्य कर रहा है।आज सुलभ इंटरनेशनल सामाजिक सम्मान,स्कैवेंजर के सर पर मैला ढोने की कुप्रथा को समाप्त करने हेतु सदा से ही प्रयासरत रहा है।अब तक 10,00,000 से अधिक स्कैवेंजरों मानवाधिकार और उसके सम्मान को स्थापित करने में सफल रहा है।लगभग सुलभ ने अभी तक 12 लाख घरेलु शौच-गृह का निर्माण, 7500 से अधिक सामुदायिक शौचालय, 192 मानव-अपशिष्ट आधारित बायोगैस संयंत्र का निर्माण किया है तथा 640 शहरों को स्कैवेंजर मुक्त बनाने का कार्य अनवरत किया है।
दर असल, सुलभ - आंदोलन के संस्थापक, युगपुरुष,स्वच्छता के प्रणेता, पुरोधा,पद्म विभूषण से अलंकृत डॉ. विंदेश्वर पाठक जी एक दीपक की तरह समूचे देश नहीं बल्कि विदेशों में भी अपना प्रकाश फैलाते रहे।आकाश में चमकते सितारे की तरह विश्व पटल पर चमकते रहे। आज उसी का परिणाम है कि लाखों लोगों के जीवन में प्रकाश,नयी ऊर्जा का संचार हुआ है। एक दीपक ने अपनी रोशनी से लाखों स्कैवेंजर्स,अस्पृश्य तथा समाज के वंचित गरीब तबक़े के लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला दिया।स्कैवेंजरों के सामाजिक सम्मान,स्वच्छता,सामाजिक जन-कल्याण, मैला ढोने जैसे अमानवीय कुप्रथा को समाप्त करने के लिए पद्म विभूषण,समाज-सुधारक डॉ. विदेश्वर पाठक जी जीवन भर संघर्षरत रहे। वास्तव में,सुलभ आंदोलन के संस्थापक पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी गाँधी जी के विचारों से असल में प्रभावित थे। क्योंकि
"राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जब दक्षिण - अफ्रीका में तीन वर्ष (1893-96) रहने के पश्चात पहली बार घर लौटने पर 'रंग-भेद' के खिलाफ विश्व-स्तर पर सत्याग्रह किया। उस द़ौर में, 'राजकोट' में महामारी आने पर गाँधी जी ने अपनी सेवा प्रत्येक मुहल्ले तक पहुंचाई। जिसमें अस्पृश्यों के घरों तक जाना, शौचालय की जाँच - पड़ताल करना तथा उस क्षेत्र के निवासियों को स्वच्छता के बेहतर तरीके सिखाना । दर असल, लंबे समय से चले आ रहे चंपारण के किसानों के प्रति अत्याचार को समाप्त करने के लिए गाँधी जी ने सन् 1917 में भारत में पहली बार सत्याग्रह का बिगुल फूंका था। उन्होंने उन्हीं दिनों 'मॉडल नेशनल स्कूल' की भी स्थापना की, ताकि उत्तर बिहार में चंपारण के गरीब और अशिक्षित लोगों को शिक्षित किया जा सके। यहाँ तक कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी 'बापू ने अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी को गरीब लायार, वेबस, आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोग और अशिक्षित गांवों, एवं कस्बों में रहने वाले महिलाओं के बीच स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के संदेश को फैलाने के लिए कहा।"
● संदर्भ - " महात्मा गाँधी - हिज लाइफ़ इन पिक्चर्स'
इसी के चलते सुलभ आंदोलन के संस्थापक,स्वच्छता के पुरोधा, बहुआयामी व्यक्तित्व,समाज सुधारक,पद्म विभूषण सहित अनेकानेक सम्मान से सम्मानित डॉ. विदेश्वर पाठक जी ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी 'बापू' के विचारों पर चलकर उस मुक़ाम पर पहुंचा। जिसकी कल्पना भी नहीं किया जा सकता है।स्वच्छता, साफ-सफाई, शौचालय निर्माण,आदि के क्षेत्र में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा है। इसी तरह के सामाजिक कार्य,जन-कल्याण, स्वच्छता और स्कैवेंजरों के अधिकारों के लिए समाज-सुधारक डॉ. विदेश्वर पाठक जी सदा प्रयासरत रहे।
इसी संदर्भ में भारत के पूर्व राष्ट्रपति 'मिशायल मेन', वैज्ञानिक डॉ. ए. पी. जे अब्दुल कलाम ने कहा था ---------------
" देश में स्वच्छता की स्थिति में सुधार लाने के लिए जो एक संस्था कार्य कर रही है, वह सुलभ है, जिसकी स्थापना डॉ.विन्देश्वर पाठक ने सन् 1970 में की। अंतर्रष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यह सबसे बड़ी अखिल भारतीय सामाजिक सेवा संस्थान है,जिससे 35,000 से भी अधिक स्वयंसेवी कार्यकर्ता संलग्न हैं। इसकी शुरुआत स्कैवेंजरों -पुरुषों और महिलाओं, जो मानव - मल को ढोते और निष्पादित करते थे ----- की मदद करने की समाज-सुधारक,डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी की अदम्य इच्छा से हुई।"
● डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम
(भारत के पूर्व राष्ट्रपति )
दरअसल, सुलभ इंटरनेशनल की कहानी केवल शौचालय बनाने की नहीं है, बल्कि यह सम्मान, स्वच्छता और सामाजिक समानता की कहानी है। यह संस्था दिखाती है कि एक व्यक्ति का संकल्प पूरे समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।पद्म विभूषण,सुलभ-आंदोलन के संस्थापक, 'स्वच्छता के गांधी', समाज-सुधारक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी एक दीपक बनकर लाखों लोगों के जीवन में परिवर्तन ला दिया। इससे कहीं न कहीं समाज के प्रति उनका अथाह प्रेम दिखाई देता है। समाज की पीड़ा, दर्द, वंचित और अछूत तबक़े के लोगों की आह अपने सीने में लेकर चला एक आम आदमी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी' बापू' का सिर्फ़ सपना पूरा नहीं किया बल्कि उनके अथक प्रयास, उनका दृढ़-संकल्प, काम के प्रति समर्पण और उनकी दूरदर्शिता सोच ने उन मुकाम पर पहुंचा दिया। जिसकी कल्पना भी नहीं किया जा सकता है। वो महान व्यक्तित्व, स्वच्छता के प्रणेता, समाज-सुधारक, पद्मविभूषण से अलंकृत ओर कोई नहीं, बल्कि सुलभ आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे।
भारत के पूर्व प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू कहा करते थे -----------
" जिस दिन हम में से हरेक को शौचालय- प्रयोग की सुविधा मिलेगी, तब मैं समझूँगा कि हमारा राष्ट्र प्रगति के शीर्ष तक
पहुँच चुका है।"
●पंडित जवाहर लाल नेहरू
'सुलभ इंटरनेशनल' एक ऐसी संस्था, संगठन जो असाधारण विशिष्ट कार्यों के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनवरत कार्य किया है। पिछले चार दशकों से अधिक समय से स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।सुलभ इंटरनेशनल एक संगठन नहीं,बल्कि एक आंदोलन है,जो स्कैवेंजरों द्वारा मानव मल-मूत्र को साफ करने तथा सर पर मैला ढोने के अमानवीय,घृणित और अपमानजनक कार्यों से उन्हें मुक्त कराने का कार्य लगातार कर रहा है।स्कैवेंजरों और सर पर मैला ढ़ोने वाले लोगों के मानवाधिकार एवं सम्मान की रक्षा एवं उनके हितों के लिए सुलभ इंटरनेशनल पूर्ण रूप से संकल्पित है और अनवरत इस दिशा में काम कर रही है।
स्वच्छता और स्कैवेजरों की दशा, दुर्दशा देखते हुई कभी इंदिरा गाँधी जी ने कहा था -------------------------
" भारत में स्वच्छता सिर्फ़ साफ-सफाई ही नहीं है, यह उन स्कैवेंजरों की दुर्दशा एवं अपमान का अंत हैं, जो अपने सर पर मानव - अपशिष्ट ढ़ोते हैं। "
● इंदिरा गाँधी
वहीं दूसरी तरफ़ एच. आर. एच. विलेम एलेक्जेंडर ( प्रिंस ऑफ ऑरेंज ऑफ नीदरलैंडस् ) ने सुलम इंटरनेशनल के बारे में अपना विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा ------------------------
" हाल ही मेरी नई दिल्ली की यात्रा के द़ौरान सुलभ इंटरनेशनल ने मेरे सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया। इस संगठन ने सिद्ध कर दिया है कि छोटे पैमाने के समाधान कितने प्रभावी हो सकते हैं और उन्हें थोड़े समय के भीतर पूरे भारत में कैसे विस्तारित किया जा सकता है। 'भुगतान और उपयोग' पर आधारित हजारों सार्वजनिक शौचालय और स्नानघर तथा 10 लाख से अधिक पोर - पलश शौचालय निजी घरों में निर्मित किए गए हैं,जिनका सुचारू रूप से रख-रखाव किया जा रहा है। रोज़ एक करोड़ से अधिक लोग उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा करके सुलभ ने हजारों अस्पृश्यों को मानवीय गरिमा के साथ एक नया भविष्य दिया है।"
● एच. आर. एच. विलेम एलेक्ज़ेंडर
(प्रिंस ऑफ ऑरेंज ऑफ द नीदरलैंड्स, जल और स्वच्छता पर राष्ट्रसंघ के महासचिव के सलाहकार --- मंडल के अध्यक्ष )
●अवसर : 21 नवंबर, 2007 को न्यूयॉर्क में इंटरनेशनल ईयर ऑफ सैनिटेशन के प्रारंभ के अवसर पर
'सुलभ इंटरनेशनल' के सामाजिक जनकल्याण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य को देखते हुए भारत के पूर्व प्रधान मंत्री श्री पी.वी.नरसिंह राव ने कहा था कि --------------------------------------
" इस क्षेत्र में कुछ समाजसेवियों द्वारा कुछ अच्छे कार्य हुए हैं, उदाहरण के लिए सुलभ का प्रयास "
● श्री पी. वी. नरसिंह राव
(भारत के पूर्व प्रधानमंत्री)
सुलभ के 'जनक',महान शख्सियत,विराट व्यक्तित्व,स्वच्छता के गांधी,समाज-सुधारक,पद्म विभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे।स्वच्छता के क्षेत्र उनका अभूतपूर्व योगदान रहा है। यह सुलभ चेतना का ही परिणाम है।
हालांकि, सुलभ इंटरनेशनल के उत्कृष्ट कार्य को देखते हुए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी ने सहज भाव में कहा कि ---------------------------
"सुलभ ने शिक्षा एवं जागरूकता-अभियान के माध्यम से स्वच्छता के प्रति लोगों की मानसिकता में परिवर्तन ला दिया है। स्कैवेंजर परिवार के बच्चे, सुलभ के स्कूल में मंत्रों का उच्चारण करने लगे हैं, जो निश्चित रूप से परंपरा में बदलाव है। सुलभ लोगों की प्रशंसा और कृतज्ञता के योग्य है,जो व्यापक संस्थागत नेटवर्क के माध्यम से सामाजिक अवरोध को समाप्त कर पाया है। आज इसकी आवश्यकता है कि देश के सभी गाँवों और शहरों में यह फैल जाएं।"
श्री चंद्रशेखर
(भारत के पूर्व प्रधानमंत्री )
वहीं दूसरी तरफ़ सुलभ इंटरनेशनल के परिसर में 16 मार्च, 2000 में डॉ. राजा रमन्ना जी का आगमन हुआ। जो राज्यसभा, सांसद थे। सुलभ परिसर, जो पालम - डाबरी, Mahavir Enclave में स्थित है। इस परिसर में आने के बाद उन्होंने कहा कि
“ मेरा यहाँ आना बहुत उपयोगी रहा, क्योंकि यहाँ छोटी-छोटी चीजों से अनुसंधान हुआ है, जो एक समुदाय को देश के लिए बड़ा कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।"
●डॉ. राजा रमन्ना
(सांसद, राज्यसभा )
दरअसल, सुलभ - स्वच्छता, सुलभ-आंदोलन के 'जनक', पद्मविभूषण , सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी, जिन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी 'बापू' के दृष्टिकोण और विचारों पर चलकर लाखों लोगों, स्कैवेंजरों के मानवाधिकार एवं सम्मान दिलाने के लिए निम्न तबक़े के लोगों के अधिकार, सम्मानों की रक्षा के लिए जीवन-भर संघर्षरत रहे। और इन्हीं अछूत लोग, जो समाज में कई अधिकारों से वंचित थे। उस द़ौर में छूआ-छूत की कुप्रथा भयावह रूप ले रखी थी। उसी वंचित समाज के लोगों की दर्द,आह, पीड़ा,अपने सीने में लेकर चला एक युवा समाजसेवी ओर कोई नहीं, बल्कि डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे। स्कैवेंजरों के मानवाधिकार एवं सम्मान दिलाना,अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
वास्तव में, समाज-सुधारक डॉ. विदेश्वर पाठक जी एक युग दृष्टा,समाज-सेवी थे,जो कभी सर पर मैला ढ़ोने वाले परिवारों के घर पर लगभग चार महीनों तक रहे, उनके साथ भोजन भी किया। वे न केवल सफाई के प्रबंध के तरीकों का विकल्प ढूँढ़ा बल्कि उन्होंने अस्पृश्यों यानि सर पर मैला ढ़ोने वाले मैला ढ़ोने वाले निम्न तबक़े के लोगों के मानवाधिकार एवं सम्मान को भी स्थापित करने में सफल रहें। दरअसल, अस्पृश्य कहे जाने वाले लोग, अथवा समुदाय, जो अपनी घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर थे। निम्न वर्गो के लोगों की जिंदगी में भयावह तकलीफ़, अपमान, तिरस्कार और शोषण का कोई उदाहरण नहीं है। सबसे निष्कृष्ट और घृणित दृष्टि से ये स्कैवेंजर्स समाज में देखे जाते थे। लेकिन शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव अथवा समाज में जागरूकता आने से आज के द़ौर में कमोवेश कमी आई है। अस्पृश्य समुदाय के लोग कभी निम्न स्तर के जीवन जीने को मजबूर थे, तथा अमानवीय जीवन व्यतीत करते थे। और समाज में अस्पृश्य जाति के लोग कहीं न कहीं क्रूर सामाजिक व्यवस्था के शिकार थे। लेकिन इस द़ौर में थोड़ी कमी आई है। हालांकि उनकी कहानी हृदयविदारक थी। अस्पृश्यों के मानवाधिकार के उल्लंघन की हृदयविदारक, शोक-संताप, आह, समाज के वंचित तबक़े के लोगों की पीड़ा की व्यथा की कहानी है। दरअसल, स्कैवेजरों के साथ इतनी क्रूरता पूर्ण व्यवहार क्यों होती रही है? यह कहीं न कहीं समाज पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
बहरहाल, आर. ई. एन्थोवन ने अपनी उत्कृष्ट रचना 'ट्राईब्स् ऐंड कास्ट्स ऑफ बॉम्बे सिरका ' 1920' में यह लिखा है कि स्कैवेंजर्स हिंदू-समाज के कूड़ा-करकट थे। वे बहिष्कृत समुदाय के
सम्मिश्रण थे, जो इस निम्न स्तर तक उच्च जाति की सामाजिक आचार-संहिता के कारण गिर गए थे। स्कैवेंजरों को हिंदू समाज की मुख्य धारा से अमूमन अलग कर दिया था और अपृश्यों को अपमानजनक, तिरस्कार की भावना देखा जाता था। स्कैवेंजरों को समाज में बड़े ही तिस्स्कार भरी नज़रों से देखा जाता था। अछूत जाति के लोग एवं मैला ढ़ोने वाले निम्न तबक़े के लोगों को मंदिर में जाने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि ऐसा इसीलिए उच्च वर्ग के लोग करते थे, कारण यह था कि उन्हें अपनी धार्मिक पवित्रता खोनें का डर रहता था। भारत देश में स्कैवेंजरों यानि निम्न तबक़े के लोगों की स्थिति बदतर थी। आर्थिक रूप से कमजोर, लाचार, बेवस, और अभावग्रस्त जीवन जीने को मजबूर थे।
दरअसल, कई प्रकार स्कैवेजरों को अपने मालिक का "जूठा खाना" खाने की नौबत उस द़ौर में थी। उन्हें वेद, उपनिषद, ग्रंथ आदि पढ़ने और मंत्रों का उच्चारण करने की अनुमति नहीं थी। उनके जीवन में हमेशा अभाव, भयावह तकलीफ़, तिरस्कार, शोषण और ज़िल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर थे। वास्तव में, कोई भी मानव इतना क्रूर और अमानवीय नहीं हो सकता,जैसा कि अस्पृश्य समुदाय के लोगों को सहना पड़ा है। यह बड़े ही दुःख की बात है। हालांकि सुलभ ने चार दशक के पुराने संघर्ष के अंतर्गत इसने लगभग 10,00,000 से अधिक स्कैवेंजरों को मुक्त करने का काम किया है और सफल भी रहा है...
स्वच्छता के प्रणेता, समाज-सुधारक और देशभर में अनेकानेक सम्मान से सम्मानित पद्म विभूषण से अलंकृत डॉ. विदेश्वर पाठक जी ने वाल्मीकियों के विरुद्ध हो रहे अन्याय के निवारण के लिए प्रतिबद्ध होकर कड़ी मेहनत की। और अंत में उन्होंने एक ऐसी तकनीक विकसित किया, जिससे लाखों-लाख बाल्टी युक्त शौचघर (पोर - पलश ) शौचालयों में परिवर्तित हुए। वाल्मीकि समुदाय के प्रति लोग उस द़ौर में कितने क्रूर और निष्ठुर होते थे,इसकी अनुभूति उन्हें नहीं होती थी। समाज सुधारक डाँ. विदेश्वर पाठक जी के लिए स्कैवेंजर अथवा वाल्मीकि समुदाय के लोगों की मुक्ति, अधिकारों से वंचित लोग, जो कभी सर पर मैला ढोने का काम करते थे। जिसे समाज में अपमान जनक एवं घृणित माना जाता था। वंचित, अछूत जो छूआ-छूत की भावना से समाज में पीड़ित थे। उनके इस तरह के कुप्रथा से मुक्ति दिलाना समाज सुधारक डॉ. विदेश्वर पाठक जी के लिए भी आसान कार्य नहीं था। यह अत्यंत कठिन और दुष्कर कार्य था। वास्तव में, समाज में सदियों से चल रही कुप्रथा, कुरीतियों और सामाजिक विभेद, सामाजिक असमानता को हटाना और उन वंचित तबक़े के लोगों के उत्थान एवं उनके अधिकारों के बारे में सोचना और समाज के मुख्य धारा में जोड़ना। यह कोई आसान कार्य नहीं था। यह बेहद कठिन और दुष्कर कार्य होता है, क्योंकि सदियों से चली आ रही सामाजिक विषमता,विभेद को हटाने में कई वर्षों का समय लगता है। दर, असल, सुलभ- आंदोलन द्वारा वाल्मीकियों को पुनर्वासित कर उन्हें बैकल्पिक रोज़गार देना उनका एकमात्र लक्ष्य था।समाज के मुख्य-धारा से जोड़ना था। श्री दीपक वोहरा कहते हैं -----------------
' सुलभ ने यह कर दिखाया है कि राष्ट्रीय सजगता के केंद्र में स्वच्छता, स्वास्थ्य का ध्यान तथा सुरक्षित पेयजल को रखकर ऐसा किया जा सकता है। यदि सुलभ का मॉडल को भारतीय अंगीकार कर लेते हैं तो जीवन की गुणवत्ता बढ़ेगी, जिसे पूरी दुनिया आश्चर्य एवं प्रशंसा से देखेगी। दूर असल कई एजेंसियों ने गरीबी की विभिन्न परिभाषाएँ दी गई हैं।' हालांकि विश्व बैंक ने कहा है ----
"गरीबी रेखा के नीचे वे हैं, जिनकी आमदनी प्रति व्यक्ति एक डॉलर प्रतिदिन है। विश्व के 1.2 अरब गरीबों की जनसंख्या का 30% भारत में रहता है,जो गंभीर गरीबी की समस्या का सूचक है। सन् 1988 में, प्रति व्यक्ति आय 'विश्व बैंक एटलस' की सूची में दर्ज 157 देशों में भारत का स्थान 124वाँ है। क्रय - शक्ति - समता के आधार पर अमेरिका, जर्मनी, चीन और जापान के बाद भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी आर्थिक ताकत हो सकता है, किंतु प्रति व्यक्ति पी. पी. पी. की रैंकिंग में, भारत का स्थान 126 यानि की नीचे है।"
वहीं दूसरी तरफ, विश्व बैंक के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी मे अमूमन कोई कमी नहीं आई है, क्योंकि 1990 के दशक में गरीबों की 22 करोड़ 40 लाख की संख्या सन् 1997 के अंत तक बढ़कर 34 करोड़ हो गई। वहीं शहरी गरीबों की संख्या 7.3 करोड़ पर स्थिर है। इससे यह निष्कर्ष इस विश्वास की पुष्टि करता है कि सन् 1991 में आरंभ किया गया 'आर्थिक सुधार गरीबी उन्मूलन' में असफल ( एच•डी•आई• स्तर का मानदंड) रहा।वहीं पाकिस्तान के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री स्वर्गीय महबूब- उल- हक ने,जो यू• एन् •डी• पी॰ मानव विकास प्रतिवेदन प्रस्तुत करने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने मार्च 1998 में दक्षिण एशिया पर रिपोर्ट देते हुए बताया है कि ---
"भारत में 13 करोड़ 50 लाख लोगों की मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच नहीं है, 22करोड़, 60 लाख को सुरक्षित, शुद्ध पेयजल प्राप्त नहीं है, भारत की बालिग जनसंख्या का आधा साक्षर नहीं है, 70 प्रतिशत को आधारभूत स्वच्छता सुविधाओं की कमी है तथा 40 प्रतिशत लोग नितांत लाचारी, गरीबी में जीने को मजबूर हैं। विश्व के एक तिहाई गरीब भारत में रहते हैं, साथ ही विश्व की सबसे अधिक निरक्षरों की जनसंख्या भी भारत में ही है।"
हालांकि, जुलाई 1998 ई. में, टाटा - ऊर्जा - अनुसंधान संस्थान ने इस बात की पुष्टि यह कहकर करता है कि -------------
" देश की लगभग आधी जनसंख्या की पहुँच पेयजल तक नहीं है, लगभग 90 प्रतिशत जलापूर्ति प्रदूषित है तथा केवल 10 प्रतिशत सीवर - उपचार - संयंत्र कार्य करने लायक हैं।हालांकि देश में स्वच्छता एक प्रमुख और काफी विकट समस्याओं में से एक है। जिसकी ओर मुख्यतौर पर भरसक ध्यान नहीं दिया गया है।हालांकि 'स्वच्छता' एक वृहद् शब्द है।
आरंभ से ही सुलभ संस्थान का सराहनीय कार्य देश के प्रति, समाज के प्रति, स्कैवेंजरों के बच्चों के उत्थान के प्रति सदा से रहा है। हम सब भली-भाँति जानते हैं कि ------------------------
" शिक्षा ही अहम परिवर्तन और विकास की कुंजी है।"
स्वच्छता के क्षेत्र में अलख जगाने वाले युगदृष्टा,समाज-सुधारक एवं पद्मविभूषण डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी का समाज के वंचित और गरीब तबक़े के लोगों के प्रति, उनके उत्थान के लिए उनकी भूमिका सदा से ही अतुलनीय रहा है। वाल्मीकियों और दलितों के बच्चे, जो कभी शिक्षा ग्रहण करने से वंचित थे। जो कभी गरीबी की चपेट में उनका जीवन था। उन दलितों और वाल्मीकियों के बच्चे भी सबके साथ मिलकर शिक्षा ग्रहण कर सकें। वो भी कम शुल्क देकर। उसके लिए पद्मविभूषण से सम्मानित समाज-सुधारक डॉ. विदेश्वर पाठक जी ने 'गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से सन् 1992 में दिल्ली में सुलभ पब्लिक स्कूल की स्थापना की। स्कूल का उद्देश्य है, समाज के वंचित और कमजोर तबक़े के बच्चों को बेहतर, सुदृढ़ और अनुशासित जीवन के लिए तैयार करना उनका लक्ष्य था। वास्तव में, स्कैवेंजरों को, जो सर पर मैला ढ़ोने का काम करते थे। जिसके कारण उन्हें अपमान और जल्लत पर भरी ज़िदगी से मुक्त करने के क्षेत्र में कार्य करना सुलभ का उद्देश्य रहा है। सुलभ पब्लिक स्कूल वंचित, गरीब तबक़े के लोगों एवं वाल्मीकि परिवार के बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करना ही उद्देश्य रहा है।
उन छात्र- छात्राओं को अंग्रेजी और हिंदी के अलावा न सिर्फ़ आधुनिक विषयों, बल्कि पारंपरिक शिक्षा देने के अलावा उनके पाठ्यक्रम में संस्कृत भी सम्मिलित है, ताकि बच्चें भारतीय संस्कृति, ज्ञान-परंपरा और देश की विरासत को संजोरकर रखें।वहीं दूसरी तरफ़ पहले वंचित और अछूत तबक़े के लोग, जो कभी समाज में छूआ-छूत की अमानवीय कुप्रथा से पीड़ित थे। सर पर मैला ढ़ोने जैसी घृणित कुप्रथा के शिकार थे। समाज में उन्हें निम्न स्तर की भावना से देखा जाता था। उन्हें मंदिर जाने की अनुमति नहीं थी। वाल्मीकि समुदाय के लोगों को संस्कृत पढ़ने,सीखने एवं मंत्रों का उच्चारण करने की अनुमति नहीं थी।
सुलभ पब्लिक स्कूल ने उन कुरीतियों में जकड़े समाज के वाल्मीकि समुदाय को मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास किया। उनके बच्चें सभी के साथ परस्पर बैठकर अध्ययन करते हैं। वाल्मीकि छात्र-छात्राओं को किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता है, तथा उन्हें यूनिफॉर्म, किताबें, लेखन-साम्रगी इत्यादि मुफ्त प्रदान की जाती है। वास्तव में, कुशलता का विकास सबों के लिए महत्वपूर्ण है, किंतु कम पढ़े-लिखे व्यक्तियों के लिए अत्यधिक आवश्यक है। सुलभ व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र का आमतौर पर मुख्य उद्देश्य समाज के वंचित, कमज़ोर और गरीब लड़के-लड़कियों को प्रशिक्षण प्रदान करना था। जिसके माध्यम से उनके आंतरिक छिपे प्रतिभा को पहचाना।
विशेषतौर पर, वाल्मीकि घरों के बच्चें, ताकि वे नई प्रतिभा को पहचानकर उसका उपयोग अच्छी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को ठीक कर सकें। सुलभ प्रशिक्षण केंद्र का उद्देश्य कमज़ोर वर्ग के लड़के-लड़कियों को रोज़गर/व्यवसाय करने के योग्य तैयार करना। जिससे वो जीवन-मापन करने के लिए धनार्जन कर सकें, बल्कि राष्ट्र की प्रगति के साथ-साथ अपना आत्मविश्वास, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का विकास कर
सकें। समाज-सुधारक, पद्म विभूषण सहित अनेकानेक सम्मान से सम्मानित डॉ. विन्देश्वर पाठक जी समाज के निम्न तबक़े के लोगों के उत्थान के लिए अपना सफर सतत् जारी रखा। सफर शुरू करने के पश्चात् उन्हें काफ़ी कुछ सहना पड़ा। लोग हँसे, ताने दिए। लेकिन उन्होंने हार नहीं माना। बीते दशकों में अपनी चुनी हुई दिशा में अनवरत काम करते रहे। गाँधी जी के विचारों पर चलकर एक आम आदमी एक युवा समाज सेवी, युगदृष्टा, स्वच्छता के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ने सिर्फ महात्मा गाँधी जी 'बापू' का सपना पूरा नहीं किया, बल्कि उनके द्वारा किए गए कार्य ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति दिलाई। उन्होंने देश भर में वह ऐसा काम करके दिखाया, जो एक साधारण व्यक्ति के सोच से भी परे है। उनकी सोच - संकल्प, दृढ़-विश्वास और काम के प्रति समर्पण यह दिखाती है कि
' दुनिया में असंभव कुछ नहीं होता, बस व्यक्ति का सोच बड़ी होनी चाहिए।" आदमी के साहस से बढ़कर कुछ नहीं होता है।
शौचालयों का इतिहास हड़प्पा, सिंधु घाटी सभ्यता और मु-अन-जोदड़ों की संस्कृतियों जितना पुराना है। यहाँ तक कि मुगलकाल में अकबर के राज भवन के अतिरिक्त राजस्थान में भी इसके अवशेष प्राप्त हुए हैं। प्रसिद्ध गायक जेनिफर लाॅपेज को उनके पूर्व प्रेमी एफ्लेक ने उनके जन्मदिन के अवसर पर महँगा शौचालय उपहार में दिया था। वहीं दूसरी तरफ, दुनिया में किसी को पुस्तकों के संग्रह का, कला-संग्रहालय आदि का शौक होता है, लेकिन
उन्हें 'MUSEUM OF TOI LETS' संग्रहालय का विचार उनके मन में कैसे आया? स्वच्छता के गाँधी, युग दृष्टा, पुरोधा, समाज-सुधारक, पद्म-विभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक जी का कहना था ---
"जब वे लंदन - यात्रा पर गए थे तो उनकी मेडम तुसाद वैक्स म्यूजियम एक दफ़ा देखा और उसी से इस अनोखे, अद्भुत और विचित्र संग्रहालय का आइडिया उन्हें आया। उनका कहना था कि शौचालय के बारे में कोई भी बात नहीं करना चाहता और इस काम में लगे लोगों को हीन भावना से देखा जाता है। इस तरह के अनोखे टॉयलेट्स म्यूज़ियम में मु-अन-जोदड़ों और हड़प्पा संस्कृति के दौर में इस्तेमाल होने वाले शौचालयों से लेकर प्लास्टिक के बने आधुनिक शौचालयों को दिखाया गया है। क्या आपने इंसानों के शौचालयों के बारे में सुना होगा ? लेकिन क्या आपने जानवरों के शौचालय के बारे में सुना है? थाइलैंड में हाथियों के लिए बनने वाले अनोखा शौचालय या फिर में पेरिस में घरेलू कुत्ते, बिल्लियों के लिए बने शौचालयों का अद्भूत और अनोखा संग्रहालय भी यहाँ दिखाया गया है। यह सुलभ इंटरनेशनल 'म्यूजियम ऑफ टॉयलेट्स संग्रहालय' है। जो विश्व में अपनी तरह का अकेला और अनोखा संग्रहालय है।
दर असल, एक ऐसी जगह जिसके बारे में सुनकर लोग पहले हंसते हैं और फिर हैरान रह जाते हैं। क्या आपने कभी टॉयलेट म्यूज़ियम के बारे में सुना है? यह कोई मजाक नहीं है। यह है दुनिया का अनोखा संग्रहालय - 'सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ टॉयलेट्स', जो स्थित है महावीर एनक्लेव डाबड़ी - पालम नई दिल्ली में। लेकिन सवाल यह है कि टॉयलेट का भी म्यूज़ियम। आखिर क्यों इस कहानी की शुरूआत होती है एक इंसान से स्वच्छता के दूत, युग दृष्टा, पुरोधा, पद्मविभूषण जैसे अनेकानेक सम्मान से अलंकृत, समाज-सुधारक डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी से। जब उन्होंने समाज में गंदगी, बीमारियां और अपमान को बेहद क़रीब से देखा तो उन्होंने एक मिशन शुरू किया, जिसका नाम था ---- " सुलभ इंटरनेशनल "। 1970 के दशक में, बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखी । आज यह संस्था समूचे देशभर में 'सुलभ इंटरनेशनल' के नाम से जानी जाती है। हालांकि 'सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ 'टॉयलेट्स' (sulabh International Museums of Toilets ) जैसे अनोखी और विचित्र संग्रहालय की स्थापना कुछ उद्देश्यों के साथ हुई है ---------
शौचालय के ज़रिए बच्चों को शिक्षा देना, शौचालय के विकास और उसके उससे जुड़ी इतिहास के विषय में छात्रों को अवगत करना। उन्हें शिक्षित करना। वहीं दूसरी तरफ़ विश्व में अपनाई गई संरचना, सामग्री, एवं तकनीक के विषय में शोधकर्ताओं को सूचना प्रदान करना। विश्वभर में शौचालय के क्षेत्र में किए गए विकास को समझाना। वर्तमान समस्या के निदान के लिए स्वच्छता-विशेषज्ञों को अतीत से सीखने में सहायता प्रदान करना। यह संग्रहालय सिंधु घाटी की सभ्यता के विकास के प्रारंभ से लेकर बीसवीं शताब्दी के अंत तक के विकास का क्रमबद्ध रूप से दिखाता है। यह संग्रहालय प्राचीन मिस्र, बेबीलोनिया, यूनान, जेरूसलेम, क्रीट और रोम की शौचालय को प्रदर्शित करता है। सन् 1990 के समय "सुलभ इंटरनेशनल शौचालय संग्रहालय" शिक्षा और शौचालय के अतीत बता रही है।। 'सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ ट्रायलेट्स' ने समूचे विश्व में हर- जगह, किस तरह का शौचालय का उपयोग किया जाता था। वह सब संग्रहालय में दिखाने का प्रयास किया गया है। हजारों छात्र-छात्राओं , देश ही नहीं अपितु पूरे विश्व से लोग सुलभ इंटरनेशनल परिसर में आते हैं और कुछ नया अनुभव करके जाते हैं।कुछ नया सीख कर परिसर से बाहर निकलते हैं।
दरअसल, सुलभ इंटरनेशनल शौचालय - संग्रहालय (sulabh International Musuems of Toilets ) वैसे यह समाज के उन हकीक़त को बयां करता है, लोगों की पीड़ा, दर्द और उनकी आह को बयां करता है। शौचालय के इतिहास को समझने की बोध जो प्रदान करता है, वह 'सुलभ इंटरनेशनल शौचालय संग्रहालय ' है।
सुलभ इंटरनेशनल शौचालय संग्रहालय सबसे अनोखा और विशिष्ट चीज है, फ्रांस के सम्राट लुई - XIV (1638-175) के सिंहासन की प्रतिकृति, जिसमें छुपा था कमोड,जिस पर वह शौच करते हुए जनता से परस्पर संवाद किया करते थे। वहीं दूसरी तरफ़ रानी एलिजाबेथ - I के राजकवि 'जॉन हैरिंग्टन' ने सन् 1596 में प्रथम डब्ल्यू.सी का आविष्कार किया। उसने वास्तव में दो डब्ल्यू. सी एक अपने लिए और दूसरा महारानी एलिजाबेथ -I के लिए, जिसे 'रिचमंड राजमहल' के शौयालय में लगाया गया। दरअसल, समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी का सिर्फ शौचालय बनाना ही उनका लक्ष्य नहीं था। वे चाहते थे कि लोग समझे। 'स्वच्छता का इतिहास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना उसका वर्तमान । जैसे ही आप इस म्यूज़ियम के अंदर कदम रखते हैं, आप 2500 साल पीछे चले जाते हैं। यहां रखे हैं प्राचीन रोमन साम्राज्य के सामूहिक शौचालय । वास्तव में, यह सच है कि शौचालय व्यवस्था, निकासी और जल - आपूर्ति को बेहतर, सुंदर और व्यवस्थित बनाने हेतु रोम के लोगों ने बहुत कुछ किया। 17 वीं शताब्दी के प्रेम के 'क्लोका मैक्सीमा' विश्व की सबसे पुरानी निकासी व्यवस्था थी। वहीं रोम के निवासियों ने खासतौर पर, स्वच्छता पर विशेष बल और ज़ोर दिया।
दरअसल, प्राचीन रोमन सामाज्य के सामूहिक शौचालय, राजाओं के लिए बनाए गए कमोड, मध्यकालीन यूरोप के अजीब और डरावनी डिज़ाइन। कुछ टॉयलेट इतने विचित्र हैं कि आप सोचेंगे, क्या लोग सच में इनका इस्तेमाल करते थे। सबसे चौंकाने वाली बात इतिहास में शौचालय सिर्फ़ सुविधा नहीं थे। वे समाज की हैसियत और वर्ग को दिखाते थे और यहीं से शुरू होती है --- असली कहानी, 'सम्मान और बराबरी' की । आज जिस चीज़ को हम आम समझते हैं, वह कभी एक सपना थी। इस 'सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स' की हर दीवार कहती है कि सभ्यता की असली पहचान, उसकी स्वच्छता से होती है।
वास्तव में, आधुनिक समय की यह वास्तविकता है कि विज्ञान ने बीते समय में बड़ी तेजी से विकास मे निरंतर ऊँचाई छू रहा है, जिससे मानव जीवन को अत्यधिक आरामदायक बना दिया है।
तो याद रखिए, अगली बार जब आप शौचालय का उपयोग करें, एक पल के लिए ज़रा सोचिए। यह सुविधा हमें कितनी लंबी यात्रा के बाद मिली है। यहाँ आपको हड़प्पा संस्कृति और सिंधु घाटी की सभ्यता के समय बने शौचालय के प्रारूप देखने को मिलेगें। यह 'सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ टॉयलेट्स' , विश्व के सबसे अनोखा और विचित्र संग्रहालयों में से एक है, जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञानवर्धक भी है।
इसे दुनिया के सबसे अजीबो- गरीब संग्रहालयों की सूची में शामिल किया गया है। स्वच्छता के क्षेत्र में, सर पर मैला ढ़ोने वाले समुदाय और अनाथ लोगों के लिए समाजसेवी पद्मविभूषण से जैसे अनेकानेक सम्मान से अलंकृत डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी का समाज के प्रति अभूतपूर्व योगदान रहा है।यह समाज उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट कार्य,सामाजिक-जन-कल्याण को हमेशा मन मस्तिष्क के पटल पर स्मृति रूप में सदा याद रखेगा।उनके सामाजिक कार्य को यह समाज कभी नहीं भूल पाएगा।
बहरहाल,परिवर्तन के इस आधुनिक द़ौर में यदि किसी स्वयं सेवी संस्था ने अपने स्तर पर वाल्मीकियों के हितों, उनके उत्थान के लिए, वरन् उन्हें समाज में बड़े लोगों के साथ सामंजस्य बैठाने का बीड़ा उठाना कोई सहज कार्य नहीं है। हालांकि सुलभ के संस्थापक, पद्मविभूषण,समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी का कहना था कि ------------------------------------
"सुलभ का मतलब ही है वाल्मीकियों का सर्वांगीण विकास ।' उनके परिवर्तन के लिए जो भी करना पड़ेगा, मैं स्वयं बिना किसी सरकारी सहायता के कर रहा हूँ। अंगीकृत व्यक्ति तथा उसके परिवार को किस प्रकार रोजी-रोटी मिल सके, इसका भी हम प्रयास करते हैं।"
वास्तव में, स्कैंवेंजर भारत में ए कई सालों से समाज में कुरीतियों और कुप्रथा के शिकार रहे हैं। अब भी समाज में स्कैवेंजर्स के प्रति असमानता बरक़रार है। उनके अधिकारों, समानता, ऊंच-नीच, सर पर मैला ढ़ोने वाले समुदाय के हितों और जो उनके उत्थान के लिए काम किया। उस संस्था का नाम है 'सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन'। सुलभ का आमतौर पर शाब्दिक अर्थ होता है- ' सरल,सहज । इन सबके पीछे, जो महान शख्सियत हैं, युग दृष्टा, स्वच्छता के पुरोधा, समाजसेवी, पद्म-विभूषण जैसे अनेकानेक सम्मान से देश-भर ही नहीं, अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग ख्याति प्राप्त किया। वो ओर कोई नहीं, बल्कि डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे।
उनके महान व्यक्त्वि को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि
" सफलता के बाद ही सफल व्यक्तित्व को पहचान मिलती है। सफलता का पैमाना सफल व्यक्तियों का एक ही होता है, दूसरा नहीं।" महान् व्यक्ति बनने के पीछे एक दर्द-भरी कहानी होती है, तपस्या होती है, संकल्प, आत्म- विश्वास, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ-साथ दूरदर्शिता सोच ही किसी भी आम आदमी को उच्च-शिखर पर पहुंचा सकता है। अनेक कठिनाईयों का सामना, समाज के लोगों की अपमान, तिरस्कार-दुत्कार आदि सुनकर भी अपने कर्म क्षेत्र और सही राह पकड़कर चलना कोई विरला ही कर सकता है। समाज के लोगों के प्रति समाजसेवी डॉ. विन्देश्वर पाठक जी का अथाह प्रेम, समाज के निम्न स्तर के लोगों से लगाव ही असंभव कार्य को उनके लिए संभव बना दिया।
बहरहाल, समाज-सुधारक, स्वच्छता के 'जनक',पद्मविभूषण डॉ. विन्देश्वर पाठक एक सोच है, एक संकल्प है,उनकी सोच, दृढ़-संकल्प, काम के प्रति निष्ठा, दूरदर्शिता सोच ने लाखों लोगों के जीवन में परिवर्तन ला दिया। उनके कल्याणकारी और उत्कृष्ट कार्यो को देखते हुए उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त किया।
●सन् 1984 में के. पी. गोयनका अवार्ड,
●1990 ई. में प्रबंधक महान मुजफ्फरपुर,
●1990 ई. में समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी, बिल्डर्स इन्फॉर्मेशन ब्यूरो अवार्ड से सम्मानित हुए।
● 1990- 91 में सिविक बेटरमेंट अवार्ड,मुंबई
● 1991 ई. में पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित हुए।
● 1992 में दि इंटरनेशनल सेंट फ्रांसिस प्राइज फॉर दि इन्वाॅयरन्मेंट ' कैटिकल ऑफ ऑल क्रीचर्स ', असीसी, इटली में सम्मानित हुए।
● 1992 ई. में डॉ. पिन्नामनेनी ऐंड श्री मती सीता देवी फाउंडेशन अवार्ड।
● 1992 ई. में मुंबई सिटिजन्स अवार्ड
● 1992 ई. में शहीद भूप सिंह अवार्ड फॉर सोशल वर्क
● 1992 ई. में अन्ने मुखोपाध्याय अवार्ड फाॅर सोशल वर्क ●1993 ई. में रोटरी इंटरनेशनल इस्पेक्ट्रा - 93, पार एक्सीलेन्स अवार्ड फॉर प्रोटेक्शन ऑफ इन्वाॅयरन्मेंट।
● 1993 ई. में 'इंडिया इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर यूनिटी के द्वारा 'रत्न शिरोमणि अवार्ड'
● 1994 ई. में 'इंदिरा गाँधी प्रियदर्शिनी अवार्ड '
● 1994 ई. में एन्. आर. आई. गोल्ड अवार्ड
● 1995 ई. में 'मानव सेवा पुरस्कार'
● 1995 ई. में 'विकास रत्न अवार्ड '
● 1995 ई. में 'लिमका बुक ऑफ रिकॉर्ड्स -- मैन ऑफ दि इयर अवार्ड।
● 1996 ई. में 'यूनाइटेड नेशन्स् सेंटर फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स (UNCHS), इस्तांबुल -द्वारा ग्लोबल अर्बन बेस्ट प्रैक्टिसेस्।
● 1997 ई. में 'स्कैवेजिंग को खत्म करने के लिए 'बाबू जगजीवन राम अवार्ड '।
● 1997 ई. में 'माइकल मधुसूदन दत्त अवार्ड' से अलंकृत हुए समाजसेवी डॉ. विन्देश्वर पाठक जी।
● 1997 ई. में उन्हें 'डिस्टिंग्विश्ड लीडरशिप अवार्ड' मिला।
● 1999 ई. में उन्हें 'समाज रत्न अवार्ड, लखनऊ में मिला। ● 2000 ई. में, उन्हें 'दुबई इंटरनेशनल अवार्ड फॉर बेस्ट प्रेक्टिसेस् ' मिला।
● 2003 ई. में यू. एन. ई.पी. (UNEP), बेरूत
(लेबनान) -- द्वारा ग्लोबल 500 रोल ऑफ ऑनर अवार्ड।
● 2003 ई. में यू. एन्. हैबिटाट, रियो-द-जनेरो (ब्राजील) द्वारा 'स्क्रोल ऑफ ऑनर' ।
● 2003 ई. में उन्हें 'इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार' मिला ।
● 2005 ई. में 'गुड कॉर्पोरेट सिटिजन अवार्ड'। ● 2006 ई. में 'साक्षी भारत अवार्ड' उन्हें मिला। ● 2006 ई. में 'इंटरनेशनल हयूमन राइट्स अवार्ड'।
● 2006 ई. में 'वन इंडिया वन पिपुल फाउंडेशन अवार्ड।
● 2006 ई. मे उन्हें 'महाराणा उदय सिंह 'अवार्ड मिला।
● 2007 ई. में 'डॉ. पी. एन्. सिंह फाउंडेशन' द्वारा 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड फॉर लीडरशिप इन द सोशल सेक्टर' ।
● 2007 ई. में उन्हें 'सिटिजन फोरम ऑफ ह्यूमन राइट्स, नई दिल्ली द्वारा 'भारत गौरव अवार्ड' मिला।
● 2007 ई. में 'स्वच्छता के 'जनक', समाजसेवी
डॉ. विन्देश्वर पाठक जी 'द इंडियन नेशन पब्लिकेशन द्वारा 'आर्यावर्त शिखर सम्म्मन' से सम्मानित हुए।
● 2008 ई. में राष्ट्रीय हिंदी परिषद, मेरठ द्वारा 'हिंदी वाचस्पति सम्मान से अलंकृत हुए।
● 2008 ई. में 'नेशनल इनर्जी ग्लोब अवार्ड',बेल्जियम से सम्मानित हुए समाज सेवी डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ।
● 2008 ई. में 'राष्ट्रीय गौरव सम्मान', इंस्टीट्यूट फॉर इन्वॉयरन्मेंटस् योगा एंड सोशल सिक्यूरिटी, दिल्ली में सम्मानित हुए।
● 2008 ई. में उन्हें 'हॉल ऑफ फेम अवार्ड (वर्ल्ड ट्वॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन द्वारा मिला।
● 2009 ई. में उन्हें ' अक्षय-ऊर्जा पुरस्कार', संयुक्त राष्ट्र में मिला।
● 2009 ई. में उन्हें 'फेस अवार्ड, फेस मैग्ज़ीन, नई दिल्ली में मिला।
● 2009 ई. में स्टॉकहोम वाटर प्राइज लेरिएट, स्वीडेन में मिला।
लिहाजा समाज सुधारक 'स्वच्छता के पुरोधा' डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ने 2009 ई. में 'स्टॉक होम वॉटर प्राइज स्वीडन के महामहिम राजकुमार 'कार्ल फिलिप ' के हाथों सम्मान मिला।
बहरहाल, समाज सेवी डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ने स्कैवेंजर की मुक्ति, उनके अधिकारों, उनके सम्मान के लिए लघु से बृहत् स्तर पर कार्य करने का अनवरत प्रयास किए। यह उनके सोच, साहस, दृढ़-संकल्प, काम के प्रति निष्ठा, समर्पण और दूर-दर्शिता सोच का ही परिणाम है कि आज सुलभ के कार्यो की ख्याति भारत ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है। विराट व्यक्तित्व, 'स्वच्छता के गाँधी, युग-दृष्टा, समाजसेवी डॉ. विन्देश्वर पाठक जी सुलभ चेतना का ही परिणाम है। न्यूयॉर्क शहर के मेयर न सिर्फ डॉ. विन्देश्वर पाठक जी को सम्मानित किया बल्कि 14 अप्रैल, 2016 को 'डॉ. बिदेश्वर पाठक' दिवस घोषित कर दिया।
दरअसल, साल 1970 का समय था। भारत के कई गाँवों और कस्बों में सुबह की पहली किरण के साथ लोग खुले में मैदानों की ओर जाया करते थे। लोग गांवों, कस्बों में खुले में शौच करने जाते थे। यह सिर्फ़ उन लोगों की आदतन नहीं, बल्कि उनकी मजबूरी थी। गंदगी, बीमारियां और अपमान यही उनकी किस्मत बन चुकी थी।इन्हीं हालातों के बीच एक युवा समाजसेवी,'स्वच्छता के क्षेत्र में अलख जगाने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, समाजसेवी, सुलभ-आंदोलन के संस्थापक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी, जो आज के समय में किसी परिचय के मोहताज नहीं है। समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ने समाज में रहकर समाज की समस्या को बड़ी बारीकी से समझा। उन्होंने समाज में ऐसी सच्चाई देखी, जिसने उनकी आत्मा को झकझोर दिया।उन्होंने उन महिलाओं को देखा, जो सर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा से जकड़ी हुई थी। सिर पर गंदगी से भरी टोकरी, समाज की नज़रों में तिरस्कार और जीवन में कोई उम्मीद नहीं। एक दिन एक वृद्धा ने उनसे कहा ---
'बाबूजी, क्या हमारी जिंदगी कभी बदलेगी ? क्या हमें भी इज्जत मिलेगी? यह सवाल सिर्फ शब्द नहीं था। वह एक कराह थी, अछूतों की, गरीब तबक़े के लोगों की। एक दर्द थी, पीड़ा थी, यानि कि सदियों की दर्द की पीड़ा थी। उन अछूत और वंचित वर्गों के लोगों की, जो कहीं न कहीं मैला ढ़ोने की कुप्रथा से पीड़ित थे। उसी दिन समाज सेवी डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ने ठान लिया कि वे इस अन्याय को खत्म करेगें। उन्होंने 'सुलभ इंटरनेशनल' की स्थापना की।
लिहाजा स्वच्छता के प्रणेता, युग दृष्टा, विराट व्यक्तित्व, सुलभ- आंदोलन के 'जनक', पद्म विभूषण जैसे अनेकानेक सम्मान से अलंकृत समाज-सुधारक डॉ. विदेश्वर पाठक जी एक नाम नहीं, अपितु एक विचार है, एक प्रेरणा हैं, एक संकल्प हैं। इनके बारे में लेखक मुल्कराज आनंद ने कहा है कि --------
" अमेरिका में अब्राहम लिंकन ने जो काम काले लोगों के उत्थान के लिए किया, वही काम विन्देश्वर पाठक भारत में मैला ढ़ोने वालों के लिए कर रहे हैं। ये दोनों महान् उद्धारक हैं।"
बहरहाल, आमतौर पर लोग उन्हीं विषयों पर शोध करना पसंद करते हैं, जिस पर लेख अथवा पुस्तकें आदि साम्रगी पहले से उपलब्ध हो लेकिन पद्म-विभूषण, समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी ने शोध-प्रबंध अपने विषय और पैशन के आधार पर चुना। स्कैवेंजरों और सफाईकर्मियों के उत्थान एवं मुक्ति के विषय पर अपना शोध-कार्य बड़ी तन्मयता के साथ पूरा किया।सफाईकर्मियों और स्कैवेंजर्स, जो समाज में सर पर मैला ढ़ोने जैसे कुप्रथा के शिकार थे।उनकी मुक्ति के लिए हमेशा जीवन-भर संघर्षरत रहें।अपने शोध के आधार पर उन्होंने ' मुक्ति के मार्ग ' जैसी पुस्तक लिखी।इस पुस्तक के ज़रिए सफाईकर्मियों और स्कैवेंजरों की समस्या को पूर्ण रूप से समाप्त करने पर चर्चाएं की गई है।समाज-सुधारक,पद्मविभूषण डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी के उत्कृष्ट कार्यों से समाज में अनगिनत लोगों के जीवन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। लिहाज़ा इसके अनेक ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट हैं,जो रोज़गारपरक कार्यक्रम संचालित करते हैं -----------------
● 1970 में उन्होंने ' सुलभ शौचालय संस्थान ' स्थापित किया।
● 1982 में ' बायोगैस संयंत्र' की स्थापना उन्होंने किया।
● 1984 में ' सुलभ इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्निकल रिसर्च एवं ट्रेनिंग की शुरुआत की।
● सुलभ इंटरनेशनल हेल्थ ऐंड हाइजीन संस्थान की स्थापना उन्होंने की।
दर असल, सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन ऐंड इन्वाॅयरन्मेंटल सैनिटेशन के संस्थापक पद्मविभूषण से अलंकृत महान व्यक्तित्व, समाज-सुधारक डाॅ बिंदेश्वर पाठक जी ने सर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय कुप्रथा को पूर्ण रूप से खत्म करके अछूतों,दलितों के मसीहा और पर्यावरण संरक्षण के लिए ढृढ़-संकल्पित होकर 'पर्यावरण मसीहा' की उपाधियां एवं ख्याति प्राप्त की।समाज-सुधारक डाॅ बिंदेश्वर पाठक जी ने संपूर्ण विश्व में बिहार की गौरव -- पताका लहराकर भारत को विश्व पटल पर मान ऊंचा किया...............( शेष फिर कभी)
@WriterGauravJha
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