सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार-आंदोलन के जनक कहे जाने वाले पद्म विभूषण से अलंकृत महान व्यक्त्वि डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे। उन्होंने सिर्फ़ महात्मा गाँधी जी के सपने को पूरा नहीं किया। बल्कि स्कैवेंजरों के मानवाधिकार और सम्मान दिलाने के लिए जीवन भर संघर्षरत रहा और अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। अक्सर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का कहा करते थे कि -------------
" शायद मेरा पुनर्जन्म नहीं हो,किंतु यदि ऐसा होता है, तब मेरी इच्छा है कि मेरा जन्म स्कैवेंजरों के परिवार में हो, जिससे मैं सर पर मैला ढ़ोने के अमानवीय, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तथा घृणित कार्य से उन्हें मुक्ति दिला सकूँ"
कहीं न कहीं पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी महात्मा गाँधी जी के विचारों से प्रभावित थे,और उनके विचारों को सीने में लेकर चला और लाखों स्केवेंजरों, 'अस्पृश्यों' को मानवाधिकार और सम्मान दिलाने के लिए महात्मा गाँधी के
अधूरे सपने को पूरा किया। दर असल पदम विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का जन्म 2 अप्रैल, 1943 को बिहार के वैशाली जिले के रामपुर के बघेल गांव में एक मैथिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वैसे काफ़ी अरसे से यह समुदाय ने अनेक पीढ़ियों से भारत को प्रसिद्ध विचारक, महान विभूतियाँ, शिक्षाविद, कवि, लेखक आदि दिए हैं, जो समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है।
डॉ. विंदेश्वर पाठक जी, कॉलेज में अध्ययन के लिए पटना आए और समाज शास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त किया। सन् 1964 का समय था। वे गाँव लौटने के बाद वे माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक बन गए। उन्हें शिक्षण कार्य करने में रुचि था और पसंद भी। उस दौर में, वे शिक्षक के रूप में प्रति माह सिर्फ 100 रुपए पर शिक्षण कार्य कर रहे थे, जिसके बाद में उन्हें छोड़ दिया। हालांकि उसके बाद डॉ. विंदेश्वर पाठक जी निरंतर संघर्ष करते रहें। हालांकि हर महान व्यक्तियों के जीवन में उतार-चढ़ाव चलता रहता है। लेकिन उन सबकी सोच,उनके संघर्ष, काम के प्रति निष्ठा उसे महान बनाता है। उसके बाद बिहार विद्युत-बोर्ड में कार्यरत एक पुराने मित्र की सहायता से वे 5 रुपए प्रतिदिन की दर से दैनिक वेतनभोगी के तौर पर पतरातू थर्मल पॉवर स्टेशन में कार्य करने लगे। लगभग एक वर्ष तक उन्होंने उसमें काम किया।लेकिन उनके मन में विचार आने लगा कि उच्च वर्ग के परिवार में जन्म लेना सौभाग्य की बात है। उच्च वर्ग में जन्म लेने की सार्थकता इसी में है कि कुछ अलग हटकर किया जाएँ। क्योंकि उनके मन में कुछ बड़ा बदलाव अथवा परिवर्तन लाने का विचार आने लगा था। समाज कल्याण, समाज-सेवा करने का संकल्प लेकर अपनी एक अलग पहचान और स्थान भी बनाने का विचार उनके अंतर्मन में आया। लेकिन ऐसे सपने देखना, बड़ा सोच रखना कोई विरला ही सपने को हकीकत में बदलने की क्षमता रख सकता है। क्योंकि ऐसे सपने को पूरा होने में काफी वक्त लगता है। वैसे स्वामी विवेकानंद ने कहा था --------------------------
"जितना बड़ा संघर्ष होगा,जीत उतनी ही शानदार होगी।"
इसके बाद पद्म विभूषण से अलंकृत डॉ. विंदेश्वर पाठक के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब वे बिहार गाँधी शताब्दी समारोह समिति में उन्होंने अवैतनिक रूप से हिंदी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने का काम शुरू किया। इसके बाद कुछ समय के बाद उनको पुन: स्थापना- शताब्दी समारोह समिति में 200 रुपए प्रतिमाह पर उनकी नौकरी लग गई। इस स्थापना - शताब्दी समारोह का स्थापना का उद्देश्य था समाज के निम्न तबके के या अछूत लोग, जो हाथों से मानव-मल की सफाई करते थे, उनके मानवाधिकार और सम्मान के लिए निरंतर प्रयासरत रहना। उसमें पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का स्वच्छता व्यवस्था के लिए कोई ठोस निदान ढूँढ़ना। इस प्रकार का कार्य उन्हें दिया गया था।
साथ ही, ऐसे स्कैवेंजरों, अस्पृश्यों या अछूत लोग, जो कहीं न कहीं मैला ढोने की प्रथा से समाज में पीड़ित थे। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाया जाएँ। हालांकि समाज-सुधारक, स्वच्छता के 'जनक' कहे जाने वाले पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक का परवरिश एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन दिनों में समाज में निम्न वर्ग के लोगों के साथ व्यवहार भी गलत होता था। छूता - छूत की प्रथा भी भयावह रूप ले रखी थी। इसलिए अस्पृश्य लोग यानि अछूत या निम्न तबक़े के लोग जो मैला ढ़ोने की प्रथा से पीड़ित थे।अमूमन समाज सुधारक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी को बाल्यवस्था से उनके मन में यह बात बैठा दी गयी थी कि किसी अछूत जाति को छूना नहीं है, किसी के हाथ का पानी नहीं पीना है या किसी वंचित या अछूत तबक़े के लोगों के घर पर पका खाना नहीं खाना है। हालांकि एक बार इस चीज का विरोध करते हुए उन्होंने एक अस्पृश्य का स्पर्श कर लिया तो उनकी दादी ने सबके सामने उन्हें गोबर और बालू निगलने के लिए कहा गया और गंगाजल पीने को दिया गया।
दर असल, 1970 का दशक था। भारत में खुले में शौच की समस्या बहुत गंभीर थी। गंदगी, बीमारियां और सामाजिक भेदभाव खासकर अस्पृश्यों यानि अछूत जाति के लोगों के सिर पर मैला ढोने की प्रथा समाज में प्रबल थी और बड़ी चुनौती भी।
ऐसे समय में एक महान शख्सियत, सुलभ के 'जनक', स्वच्छता के प्रणेता, समाज-सुधारक पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने का संकल्प लिया। और सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की। दूसरी तरफ़" किसी भी संस्थानों का निर्माण लक्ष्य, विश्वास, संकल्प, सामाजिक परंपराओं,संस्कृतियों,सिद्धांतों और विचारों को आगे निरंतर ले जाने के लिए होता है। आज के दौर और उस समय के दौर में जमीन और आसमान का अंतर था। उस दौर में जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा और मैला ढोने की प्रथा चरम सीमा पर थी। विकराल और भयावह रूप ले रखी थी।
हालांकि मकान हमेशा ईंट, बालू और छड़ इत्यादि से तैयार होता है। संरचनाओं का निर्माण होता है, जो समयानुसार नष्ट हो जाते हैं,लेकिन विचार और विश्वास कभी समाप्त नहीं होते हैं।भारत की संस्कृति अति प्राचीन है।वेद,उपनिषद,ग्रंथ आदि भारतीय संस्कृति के नींव है,जिसमें भारतीय दर्शन,ज्ञान-विज्ञान,विश्वास और विचार सम्मिलित हैं और आज भी यह भारतीय संस्कृति के मूल आधार है।विचार,विश्वास,संकल्प अनवरत,स्थायी और शाश्वत होते हैं और हर चीज़ समाप्त हो जाने पर भी यह विद्यमान रहते हैं।विचार और विश्वास कभी नष्ट नहीं होते हैं......................( शेष फिर कभी )
@WriterGauravJha
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