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Showing posts from September, 2018

कविता-- अटूट संबंध

रात में मां बच्चें को लोरी सुनाती है, हिंदी लोरी सुनकर खुश हो जाती है, उर्दू मां की आंचल से लिपट जाती है, यह अटूट प्रेम देखकर मां मुस्कुराती है हिंदी और उर्दू है अपने दिल की भा...

ग़ज़ल/रचनाकार:-- गौरव झा

मैं ज्वाला हूं, हमेशा  जलता रहूंगा, जो सच होगा,वहीं मैं  कहता रहूंगा, अंधेरों से हमें कोई गिला नहीं,ए गौरव मैं समंदर हूं,नदियों को लेकर चलता रहूंगा। मैं भटकता रहा कई वर्षो से,सच की तलाश में, जीने लगा था लोगों के बीच जैसे हो जिंदा लाश, पता नहीं ठिकाने पर चला था घर से सवेरे-सवेरे   मंज़िल तक पहुंचते-पहुंचते ज़रा सी देर हो गई।        अपनी कलम से रोज़ कुछ नया गढ़ता हूं,गौरव कुछ अपने कुछ लोगों की वेदना लिखता हूं, शाम के वक्त जब बैठता हूं, दोस्तों के साथ, अंतर्रात्मा से बुने गीत, जुबां से गुनगुनाता हूं।                    शहर में कैसे रहते लोग, बहुत भीड़ दिखती है, हर तरफ़,हर गली में हैवानों का सिर दिखती है, आभास हो रहा है,शायद निशा में सब सो गए हैं, आकाश देखा चांद,तारे भी मेरे साथ जाग रहें हैं। वक्त कुछ यूं चला कि सारे पत्ते पेड़ से टूट  गए, जो टुकड़ा था अपने ज़िगर का,कुछ वही छोड़ गए, पता नहीं क्या खता हुई  मुझसे,न जाने क्यूं...

कविता -- चश्मा की सच्चाई

                      कविता/चश्मा/कवि गौरव झा दुनिया देखकर चश्मा पहन लेता हूं,गौरव खुली आंखों से लोग नहीं दिखते।।। पहनकर चश्मा मैं लोगों को देख पाता हूं, उनके घर जाकर सुख-दुख में हो आता हूं। मायूस होकर अपना गीत सुनाने लगा हूं, दुनियावालों रोज निशा में अपना गीत गुनगुनाने लगा हूं।।। चश्मा पहनकर ढूंढता हूं, अकेले मैं भटककर, राहों में चलते-चलते भले कुछ तो हमें मिले। पहने रहता जब तक चश्मा,देखता हूं चीज़ों को, वर्ना इँसा कब ठोकर मारकर चला जाए।।। मुखातिब होता हूं,रोज मैं दुनिया के उस सच से, जिस पर आम लोगों की नज़र नहीं पड़ती।। मैं कई वर्षो से भटकता रहा सच की तलाश में, मंज़िल तक पहुंचते-पहुंचते ज़रा सी देर हो गई। लोगों से हमें कोई गिला या शिकवा नहीं,ए गौरव बस!इंसा में मैं सदियों से इंसानियत खोज रहा हूं। कोई कहता अपन को अच्छा, कोई कहता बुरा, आख़िर किसकी बात सुने या ना सुने पता नही,?गौरव दुख की चादर ओढ़ कर,कई रातों से जिए जा रहा हूं, जग का तमश को  अपना समझकर पिए जा रहा...

हिंदी कविता : इंसान को जीतने का जुनून होना चाहिए // गौरव झा

   G AURAV JHA ( Writer, Journalist, columnist) इंसा को जीतने का जुनून होना चाहिए, हो गर कठिन रास्ता उस पर चलना चाहिए, انسان کو حوصلہ افزائی کرنا چاہئے، اس مشکل راستے پر چلنے کے لئے یقینی بنائیں، हारकर भी जीतने का हौसला रखना चाहिए, मकाम पाने के लिए दिन-रात संघर्ष करना चाहिए। جیتنے کے لئے بھی حوصلہ افزائی کی جانی چاہیئے، کام حاصل کرنے کے لئے، آپ کو دن اور رات سے لڑنا چاہئے. गर मां का हाथ सर पे हो तो मनोबल बढ़ जाता है, मंजिल भले ना मिले,पर दिल को संबल मिलता है। اگر ماں کا ہاتھ ہاتھ پر ہے، تو حوصلہ بڑھاتا ہے، فرش نہیں پایا جا سکتا ہے، لیکن دل کا انعام ہے. जो सुकून मां की गोद में,वह शहर में कहां,ए गौरव असली खुशी तो हमेशा  गांवों में मिला करती है।। واحد ماں کے گودام میں، جہاں شہر میں، فخر ہے گاؤں میں اصل خوشی ہمیشہ ملتی ہے. भले शहर की सबको चाय की प्याली अच्छी लगती हो, हमें पटसा गांव की खेतों की हरियाली अच्छी लगती है। اگرچہ شہر میں ہر ایک کپ کی چائے کی طرح لگ رہا ہے، ہم پوٹا گاؤں کے سبز شعبوں کو پسند کرتے ہیں. टूटे भी तो इस कदर  कि, हमें फिर...