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Showing posts from October, 2019

ग़ज़ल:-- कवि गौरव झा

ग़ज़ल//कवि गौरव झा याद तुम्हारी इस क़दर मुझे क्यूँ आ रही है, पास होकर तुम दूर मुझसे हुई जा रही हो। दुनिया की भीड़ में दिखता है तन्हा पूरा शहर, दिल में इतने ख्वाइश क्यूँ हम सजाएँ जा रहे। इश्क़ में साँस थमी है, इंतज़ार है मेरे मरने की, क्यूँ मासूम आँखों में गमों को पिए जा रहे हैं। फासला क्यूँ है मोहब्बत की राह में इस कदर, निशा में हम दोनों मर-मर के भी जिए जा रहे। गुनाह है गर मुहब्बत, इश्क़ मेरी तो इबादत है, सरेआम क्यूँ मेरे नाम के सिक्के उछाले जा रहे। तन्हाई में मेरी तुम्हें याद अक्सर जब भी सताएगी, मेरे खातिर तुम भी कभी बेसबर हो ही जाओगी। ख़ामोश लब,ख़ामोश निगाहें तेरी देखी नहीं जाती मुझे, यकीनन  दिन-रात यहीं घुटन मुझे तो खाए जा रही।। इक उम्र गुज़ार दी यूँ ही मैंने तिरी तस्वीर देख-देखकर, तय करना है सफ़र साथ-साथ,क्यूँ मुझे सताए जा रही। अपनी ग़ज़ल इस दुनिया के हवाले करके हम चले जाएँगें, मंदिर में मेरे नाम की तुम भी फूल क्यूँ चढ़ाए जा रही।।

कविता:-- भूख

पटाखों की दुकां पे बच्चे को रोते देखा, चंद पैसे उसके हाथों में उसे गिनते देखा, लाचारी है ,गरीबी है ,या बेवसी का आलम, भूख की मार में गलियों में कबाड़ी चुनते देखा। एक ग़रीब बच्चो...

कविता

आदिकाल से अब तक दुष्चक्रो के ख़िलाफ़ कलम लड़ी है, चाहे दिखने में भले छोटी हो,ताकत इसकी तो बहुत बड़ी है, सर्वनाश का काले बादल जब-जब इस धरा पर ऐसे छाएगा, हे कलम!तू तब-तब अपने इस राष...
इस लुटेरों की दुनिया में सही संदेश देने आया हूं, नहीं रखना दिल में कैट, केटरीना, सलमान, शाहरुख, रखना है तो रखो अटल,कलाम,चाणक्य  के उपदेशों को, दम घुंट-घुंटकर जी रहे सब इस नफ़रत क...

शायरी

इस शहर की गलियों में दीप जलाने आया हूँ, हर मकां में दीपक बन अंधेरा मिटाने आया हूँ, ज़िंदगी के भाग-दौड़ भरे इस अंजान पथ पर, आग हूँ, तुम्हारे दिल में मैं आग लगाने आया हूँ!! ✍️ Gaurav