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Showing posts from November, 2019
लुट रहें हैं वो सरेआम देश को,तुम ऊँगली मत उठाओ, आराम से  दे दो उसे रिश्वत और तुम भ्रष्टाचार बढ़ाओ।।

गजल//कवि गौरव झा

कहीं तो मुझे दिल लगाना पड़ेगा, बुझते दिये को ज़रा जलाना पड़ेगा। साथ होकर भी जाने क्यूँ दूर-दूर है, ये भी तुझे क्या मुझे बताना पड़ेगा। बैठना कभी-कभी तुम साथ मेरे भी, तुम्हें कुछ कहानी मुझे सुनाना पड़ेगा। ख़ामोश बैठी रहती तुम भी कभी क्या, तुम्हारे मन में जो है वो भी कहना पड़ेगा। अंधेरों में जला देता हूँ ख़ुद दुनिया का दीया, बुझते दिये को ज़रा रोज़ जलाना पड़ेगा। दीपक हूँ जग का मिटाता हूँ धरा का अंधेरा, ख़ुद रोशनी बनके उजाला लुटाना पड़ेगा।। झूठ खुलेआम बेचते देख रहा हूँ इस अंधे शहर में, ए शहर!तुझे  ख़ुद आईना मुझे दिखाना पड़ेगा।।

ग़ज़ल:--- सफ़र ।।।कवि गौरव झा

सफ़र में जहाँ तुझे राहों में काँटे मिलेंगे, देखना तुम वहीं शायद हम तुम्हें बैठे मिलेंगे, बसा लिया हूँ इस जलते आँखों में समंदर, इस शहर के दरिया मिरी पास भटकते मिलेंगे, ज़ुल्म गर बढ़ेगी इस धरा पे जब-जब भी कतरा-कतरा खून से सींच दूँगा इस शहर को, फुर्सत जब मिलें तुझे कभी मिरी आँखों में झाँकना, धधकते आँखों में तुझे ये पूरा ज़माना मिलेगा। सुना है परिंदे रोज यहाँ उड़ते हैं ज़माने में बहुत, इस ज़मीं पे हमीं जो सबका हिसाब लिखते हैं। क्यूँ पूछते हो तुम मेरे बारे में इस गुमनाम अंधेरों से, ये वही दर पे लोग हैं जो मुझे बेहिसाब चाहते हैं। ख़ुद सीख रखा हूँ हुनर चलना हमेशा जलते अंगारों पे, राहों के तूफ़ान मेरा नाम लिखते आजकल दीवारों पे। गौरव सफ़र में  राहों में जहाँ कहीं तुझे काँटें मिलेंगे, देखना तुम वहीं पर शायद हम तुम्हें  बैठे मिलेंगे।।

मैं पत्रकार हूँ।

पत्रकार हूँ,अपनी संवेदनाएं लिखता हूँ, जान हथेली पे लेकर समाज हित की बात लिखता हूँ, ज़ुल्म बढ़े इस धरा पे जब भी तब क़लम से रोज़ अपनी मौत लिखता हूँ, पत्रकार हूँ,मेरी हस्ती नहीं कुछ भी, सिर्फ़ जन-जन की आवाज़ लिखता हूँ। मेरे अंदर है आग जो मुझे सच लिखने को, बैचेन करता है, कभी दर्द तो कभी सच लिखता हूँ। कभी आतंकियों से तो कभी , राजनीति से होकर गुजरता हूँ, कभी इंकलाब लिखता हूँ तो कभी रणनीति लिखता हूँ। कभी सड़कों पे, चौराहों पे गाली भी सुनता हूँ, समाज देखकर कभी चुप रहता हूँ, ख़ामोश रहता हूँ, पत्रकार हूँ अपनी कलम से रोज़ जन-जन की आवाज़ लिखता हूँ।

ग़ज़ल//कवि गौरव झा

ख़ुद को वो बहुत औरों से होशियार समझता है, ज़माना है दिलों में जिसके उसे बीमार समझता है। गुनाह करता सरेआम,ख़ुद को वफादार समझता है, सर पे ताज पहनकर सबसे वो जमींदार समझता है। बिक रहा ईमान ज़माने में,सबको वो यार समझता है, उसकी क़ातिल निगाह ख़ुद को समझदार समझता है। ताकता है शहर के आईनों में,वो वफादार समझता है, ज़माना है दिलों में जिसके उसे वो बीमार समझता है। जख्म खाकर अंधेरों में वो ख़ुद को जानदार समझता है, अंधेरा मिटाने वाले को वो सरेआम तलबगार समझता है। ख़ुद को वो बहुत औरों से होशियार समझता है, ज़माना है दिलों में जिसके उसे बीमार समझता है।