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Showing posts from December, 2019

कविता:-- आओ मिलकर क़दम बढ़ाएँ।।

अपने पावन मातृभूमि को हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी हमेशा क़दम बढ़ाना है। अपने भारत को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए, मातृभूमि के खातिर जनवासी को बीड़ा उठाना है। अपने पावन मातृभूमि को हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी हमेशा क़दम बढ़ाना है।। मिलेगें एकजुट होकर तब देश हमारा स्वच्छ होगा, जन-जन भारतवासी सब रोज़  तभी स्वस्थ होगा। आओं मिलकर  जन-जन को यही बात समझाना है। अपने इस पुण्य धरा के बारे में सबको कुछ बताना है। अपने पावन मातृभूमि को हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी एक-एक हाथ बढ़ाना है।। सुख-समृद्धि, खुशियां अगर अपने घर-घर लाना है, आओ मिलकर प्रण करें सब भारत को ऊंचा उठाना है। स्वस्थ रहेंगे सभी इस भूमि पर तब पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, हर मानवजाति यही बात सबको हमें  ज़रा  कहना है।। अपने पावन मातृभूमि को रोज़ हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी एक-एक हाथ ज़रा बढ़ाना है।। अपने देश की गंगा, यमुना,ब्रह्मपुत्र आदि नदियों को आओ मिलकर हम सबको इसे रोज़  चमकाना है, दिन-प्रतिदिन मलीन होने से  हम सबको बचाना है। स्वच्छ रहे...

जीवन है एक पूल जैसा

यह जीवन है एक पुल जैसा पुल जोड़ती तो है, मनुष्यों को दो एकता के महीन धागों में, वह पुल जो नदी पर बनी होती है,दिखने में स्थिर होती है, लेकिन पथिकों, मुसाफिरों का बोझ भी वही सहती है, यह पुल जोड़ती है हमेशा दो रास्ते के बीच की खाईयों को हमेशा अपने बंधन से, यह जीवन है एक पुल जैसा, अनगिनत यात्री का इस पुल पर आवागमन होता है, यह पुल है न तो कभी थकती है,न कभी ये विश्राम ही करती है, क़रीब से जब देखता हूँ, पूल को तब समझता हूँ कि, यह कितनों का बोझ सहन करती है,बोझ उठाती है, फिर भी स्थिर रहती है, चुपचाप शांत रहती है, यह जीवन है एक पुल जैसा, मनुष्य का जीवन भी है, एक लंबा पुल जैसा, जिस पर कितने आदमी हैं, ज़िंदगी में मिलते हैं, फिर बिछड़ते हैं, रह जाती हैं बस सबकी यादें, और कुछ खास बातें ज़िंदगी है सतत् चलते रहने का हमेशा, गुजरता हूँ जब भी किसी बनी हुई पूल के ऊपर से, देखता हूँ छोटे-छोटे बच्चे को कुछ हाथों में लेकर आस-पास चल रहे पथिक को ज़ोर-ज़ोर से उच्च आवाज़ में, पुकारते हुए,चिल्लाते हुए उस बच्चे की ज़िंदगी को देखता हूँ तो कभी सोचता हूँ कि इसकी ज़िंदगी पूल पर ...

कविता:-- पेड़

मैं पेड़ हूँ,मुझको काँटो ना, हूँ मैं सबका रखवाला, जानते नहीं तुम फल खाकर बहुत बनते हिम्मत वाला, सचमुच मैं तुम्हारा प्राण हूँ, ज़िंदगी है तुम सबकी पलती, इसी के छाँव में, मैं भी पथिक हूँ, तुम सब भी पथिक हो, काटो मत मुझे,मैं तुम्हारा रक्षक हूँ, कंद-मूल,फल फूल तुम्हें देता हूँ, तुम तो मानव,हो रहे बड़े स्वार्थी, दिन-प्रतिदिन विकास का ढोंग रचाके तुम मेरे शरीर को ही काटते हो। मैं हूँ पेड़,ज़रा मेरा अस्तित्व तुम बचाओ, विकास चाहते हो गर समाज का तुम तो, बेफ्रिक होकर समाज हित का काम करो, लेकिन मैं पेड़ हूँ,एक काटो तो चार लगाओ‌। हैं सुरक्षित मुझसे ही ये जगवासी, आँक्सीजन तुमको हमेशा देता हूँ, बदले में तुमसे कुछ मैं नहीं लेता हूँ, मैं पेड़ हूँ,तुम सबका हूँ मैं जीवन दाता, हे मानव!चेत जाओं ज़रा मुझसे तुम, मैं हूँ पेड़ ,मुझको तुम मत काटो। मुझसे ही तुम सबकी जीवन टिकी है, ये मत भूलों, ऐसे धरा पर तुम मुझे काटोगे, इक दिन धरती पर सब कुछ मिटता नज़र आएगा, तुम्हारा जीवन का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। मैं हूँ पेड़ , मुझको तुम मत काटो, ऐसे ही अगर मुझे दिन-प्रतिदिन काटोगे, हे मानव!धी...

गजल:-- एकता में बल

बाँट रहे हो मुल्क को क्या,नहीं है तुम्हें कुछ भी ज्ञात, मत बाँटों हिंदू-मुस्लिम को,क्यूँ पूछ रहे तो तुम जात। ईश्वर,अल्लाह, ख़ुदा एक ही हैं,यही है असल कहानी, नफ़रत फैलाते रहो आपस में तुम ऐसे बेकार है जवानी। यह मुल्क है बलिदानों की,हिंद की यही एक कहानी है, हिंदू-मुस्लिम,सिख-ईसाई एक हैं,मिलकर हिंदुस्तानी हैं। गुनाह करते हो सरेआम,इसका तुम्हें कुछ भी नहीं है भान भ्रष्ट होकर लुटते हो देश को तुम,इसका नहीं है तुम्हें ज्ञान। सेंक रहे राजनीति के दम पे हैं रोटी,यहीं है इनका एजेंडा, आम जनता मरती रहे दम घुट-घुटकर यही है इनका फंडा। राजनीति के मठाधीश कहाँ ले जाएँगे देश को,नहीं है ज्ञान, वोट से पहले हर घर में पहुंचते,करते हैं सभी को प्रणाम। दम तोड़ रही इनकी झूठे नारेबाज़ी,हैं यह सदा से बदनाम विकास के नाम पे भोली जनता को  करते हैं ये गुमनाम।। मुल्क में जो पत्थर बाज है,नहीं है जिसे अपने देश से लगाव, गद्दारों और देशद्रोही के कुचल दो फन,इसको नहीं बचाओ। बाँटते हैं इंसानों को जाति  में ,राजनीति का ये है पुराना दाँव, मत फैलाओ पंख इतना,खींच सकती है जनता तुम्हारे पाँव।।

कविता:-- माँ सरस्वती

हे माँ सरस्वती मुझे तु ही ज्ञान दो, हो सकल मनोरथ,मुझे वरदान दो, हे माँ सरस्वती मुझे तू ही मान दो, माँ शारदे!तू है जग में हँसवाहिनी, वागीश! वीणावादनी,तू है मातेश्वरी, हे माँ सरस्व...

कविता:-- मंज़िल

हार और जीत जीवन का हिस्सा है, हार में जीवन नीरस हो जाता है, जीत में आँखों में सुखों और आनंद का छलावा, जीवन है क्या?यह एक यात्रा है, जहाँ ज़िंदगी में हार और जीत दो पहलू हैं जीवन को ...

कविता// माया-मोह

एक इंसान कितना भी हो बहादुर,शुरवीर और शक्तिशाली, लेकिन माया-मोह से इस दुनिया में कोई परे नहीं, दिखता है जो जैसा इंसान, आज वैसा होता नहीं, जो वास्तव में जैसा दिखता है,उसे न जाना...

कविता-- फरेबी दुनिया

हम  लोग हैं "गौरव"ऐसे जल्दी किसी के जान का सौदा  कभी भी नहीं करते, करते हैं गैरों को अपनी जान देकर बचाना,लेकिन जियादा हम दिखावा नहीं करते। कलमकार हूँ ,इस झूठे फरेबों के बाजारों को देखकर चुप रहते हैं कभी-कभी बेशक, जो हूँ वहीं लिखता हूँ, दुश्मन भी गर प्यार से मिले तो लुटा देता हूँ अपनी जान, जो हूँ अपनी बदौलत फिर भी हर किसी को मसलने की हम तमन्ना नहीं करते। हथेलियों की लकीरों से जियादा खुद पे होता है भरोसा,नफ़रत के बीच हम बोया नहीं करते, थक जाते हैं चलते-चलते हम अक्सर  इस दौर में बेशक, लेकिन किस्मत पे कभी हम रोया नहीं करते। फरेबों की दुनिया में बिकते हैं ईमान रोज़, हैं क़लम के बेटे  हम जल्दी सौदा नहीं करते, आदतन है मेरी सच लिखने की हमेशा,मौत भले आ जाएँ लेकिन समझौता नहीं करते। करते हैं झुककर गुफ्तगू अपनों से इस दौर में हम बेशक" ए गौरव" गरजते हैं जो बादल पता है मुझे,वो जमीं पे कभी बरसा नहीं करते।

कविता//वीरों की कुर्बानी//कवि गौरव झा

हे नमन।उन वीरों को जो राष्ट्र के खातिर अपनी जान दे डाला था, ब्रिटिश अंग्रेजों के हुकुमतों के ख़िलाफ़ जो आवाज़ उठाया था, मौत और कफ़न हाथ में लेकर सरेआम जो बिना डरे सड़क पर जो चलते थे, नमन है!भगत, चंद्रशेखर, राजगुरू को जिसने आजादी की चिंगारी पूरे देश में जलाई थी। बहुत हुआ देश में अब आतंकी हमला,अब और नहीं होने देना है, वतन के खातिर मरकर भी अब देश के मासूमों को ज़रा बचाना है। मचा रखा है भीषण उत्पाद मठाधीश और कुर्सियों के पुजारियों ने,अब और न होने देना है, हे राष्ट्र जागो!अपने अनगिनत राष्ट्र के वीर शहीदों के कतरा-कतरा खून का बदला अब तो लेना है। है अगर सीने में हिम्मत तो ज़रा आगे आओ,पीछे से क्यूँ तुम लड़ते हो, बेकसूर और मासूमों को क्यूँ तुम मार रहे, आगे आने से क्यूँ डरते हो। हे कलम! अब सत्ता पे बैठे लालची मठाधीशों के खिलाफ एक हुंकार भरो, अपने इस देश की खातिर क़लम की नोक से इस सबका  उद्धार करो। जीवन है क्या?यह तो क्षणभंगुर है।मिट्टी ही है इक दिन इस देश की माटी में मिल जाना है, लाख झंझावात और विपदाएं आए तो ग़म न कर तू,अपने देश को अहिरावण से बचाना है। साँसे हैं जब तक इस तन मे...

कल्पनाओं की एक अलग दुनिया

        GAURAV   JHA ( Writer, Journalist, columnist) कल्पना का क्षेत्र हर दुनिया से विशाल है,बड़ी है।इस सृष्टि का जब से निर्माण हुआ है तब से लेकर अभी तक कितने ऐसे मर्मज्ञ मनीषी,विद्वान,चिंतक और दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने अपने सुक्ष्म ज्ञान, अनुभव, मनन-चिंतन और कल्पना के आधार पर समाज को सतत् सही दिशा की ओर बढ़ने हेतु प्रोत्साहित किया है सही मार्ग दिखाया है।यह हम कह सकते हैं कि वास्तव में कल्पना की दुनिया का कोई सीमित क्षेत्र नहीं है,इसका विस्तार विश्व में विशाल है जिसकी गति को न तो जाना जा सकता है और न ही दुनिया के किसी भी यंत्र के द्वारा एक निश्चित पैमाने को ज़हन में रखकर मापा जा सकता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में परस्पर लोगों के साथ मिल-जुलकर रहना, जीवन-यापन करता है।वह समाज में रहकर समाज के अंदर पल रहे अच्छाईयों और बुराईयों से अवगत होता है। धीरे-धीरे अपने ज्ञान,कला-कौशल और अनुभवों के आधार पर वह जीवन के मूल कर्त्तव्यों, सिद्धांतों से अवगत होता है,उसे समझता है।जीवन के विभिन्न आयामों, पहलुओं को अपने बुद्धिमता अनुसार समझता है और कहीं न कह...

क़िताब

एक किताब ही मनुष्यों के चरित्र निर्माण के साथ-साथ उसके भविष्यों को सँवारने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जैसा कि हम सब प्राय: कहते हैं कि जैसा व्यक्ति का खान-पान, रहन-सहन होते हैं,उसी प्रकार समस्त सामाजिक प्राणियों के विचार भी वैसे ही होते हैं।एक मकान की नींव की तरह होती है 'किताब', जिस पर हर मनुष्यों के जीवन की भविष्य टिकी होती है।यह एक ऐसी शक्ति है जो दुनिया के हर बेशकीमती चीज़ों से ऊपर है।हम कह सकते हैं कि------------------------------------ "एक किताब के बिना मनुष्यों का जीवन नीरस है या अधूरा  है!!" दरअसल यह एक रास्ता है जिस पथ पर चलकर सिर्फ़ बच्चों का चारित्रिक विकास ही नहीं होता बल्कि इससे उसका शारीरिक विकास होने के साथ-साथ उसका मानसिक विकास भी होता है।यह एक बेशकीमती कोहिनूर है।यह एक माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य समाज के मूल-कर्तव्यों, नीतियों, सिद्धांतों, वसूलों को समझता है। जिससे वो अंजान हैं, अपरिचित हैं। उसे गहराई से तथ्यों, पहलुओं और महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करता है।यह कहना बिल्कुल  ग़लत नहीं होगा कि----------------------------- " एक किता...
इस जलते आँखों ज़रा ढूंढ़ सको ढूंढ़ों  शोले हैं, यही मठाधीशों के मकां गिराने के लिए काफ़ी है।

कविता:-- कलम//गौरव झा

 हर गरीब, निसहाय बेवश लोगों की अंतर्मन की, व्यथा लिखती है कलम, कभी ख़ुशी तो कभी ग़म कागज़ को भिगोकर, नए-नए शब्दों को हमेशा, गढ़ती है क़लम!! है यह दिखने में बहुत छोटी, ताक़त है इसकी बहुत बड़ी, बेजुबानों की आवाज़, हर युगों में बनती है क़लम, ज़ुल्म,अत्याचार के खिलाफ ख़ुद यह महाशक्ति बनकर लड़ती है मेरी क़लम!! हर घरों के झलकते आँसूओं, पीड़ा,वेदनाओं को समझकर, चलती है क़लम!! छोटी-छोटी राष्ट्र की कमियों और खूबियों को उजागर करती है प्यारी क़लम!! भागदौड़ भरी ज़िंदगी के हर मोड़ पर एक दोस्त की तरह, हमेशा साथ देती है क़लम!! प्रेम की भाषा लिखती, समाज में पल रहें विकृतियों, को भी मिटाती है क़लम!! द्वेष,घृणा, नफ़रत को मिटाकर, शिष्टाचार का हमेशा पाठ पढ़ाती है मेरी क़लम!! दूर करती यह हमेशा नीचता,समाज में पल रहें, बुराईयों,अपराधों को, मिटाती है यह क़लम।। यह भ्रष्टाचार,आतंकवाद के खिलाफ एक हथियार, बनकर लड़ती है क़लम।। राष्ट्र पर जब-जब काले बादल मँडराते हैं, आग उगलती है क़लम!! विपत्ति छाती है राष्ट्र पर, लाखों बेजुबान लोगों की आवाज़ बनकर ख़ुद, क्रांति लाती है यह...