Skip to main content

Posts

Showing posts from February, 2020

ग़ज़ल

यूँ ही बेवजह बातें बनाना ठीक नहीं, बेवजह अब यूँ भी मुस्कुराना ठीक नहीं, दिल दे दूँ या अपना जान सरेआम तुझे दे दूँ, कमबख्त इश्क में किसी को रूलाना ठीक नहीं। याद में हर-पल आना किसी का ठीक नहीं, किसी की याद में ख़ुद को तड़पाना ठीक नहीं। लाज़िम ही है ख़ुद को किसी के नाम कर देना, ये ज़रूरी नहीं कभी मन की बात सबको बताना। गिरते आँसूओं का अब इस ज़माने में मोल नहीं, ख़ामोश रहकर मुहब्बत में दिल जलाना ठीक नहीं। जीता कौन है जमीं पे गौरव ख़ुशी से इस ज़िंदगी को, तन्हाई में भी ख़ामोशी से मन बहलाना ठीक नहीं।। आदतन कहो या फितरत है यहाँ पे मुहब्बत लुटाना, अपनों से जंंग जब हो तो लाज़िम है ख़ुद हार जाना। गिला करें भी तो क्या करें "गौरव"ख़ुद हार गया हूँ, नफ़रत के शहर में ख़ुद को जलाना अब ठीक नहीं।।

ग़ज़ल:--

जनसंख्या वृद्धि हर दिन बढ़ता जा रहा, बोझ से अपनी धरती अब दबता जा रहा। दरिंदगी रूक नहीं रही है अब कहीं मुल्क में, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ सर पार होता जा रहा। ग़ज़ब  दौर है राजनीति का, ग़ज़ब के हैं नेता अब पिछले वायदे भूलकर नए अब वादें करते जा रहे। सब बैठे थे छुपाकर अपना चहरा उस महफ़िल में, आदमी को झूठा भरोसा दिलाकर ये छलते जा रहे। कर न पाए इंतज़ाम अभी तक मुल्क में रोज़गार का, डिग्रियां लेकर युवा दफ्तर के रोज़ चक्कर लगाते जा रहे। उठता जा रहा है अब आम जनता का भरोसा अब यहाँ, राजनीति के पेंच  ख़ुद वो भी अब देखों समझते जा रहे। मुमकिन नहीं है क्या "गौरव" इसका निवारण  धरा पे, झूठे बयानबाज़ी करके वो भी ख़ुद-ब-ख़ुद लड़ते जा रहे
अभी-अभी धूप उगी है, काम करने की सबने अब कुछ मन में ठानी हैं, सूरज चाचा भी सो गए हैं, वो अपना होश खो दिए हैं, वर्षो से सूरज ने बंद कर लिया है अपना दरवाजा, क्योंकि भीषण आग की लपटों में इंसान भुगते न कभी भी गलत ख़ामियाजा, सूरज का अंदाज़ गजब है, वह है आग का गोला, रहो ज़रा इससे थोड़ा दूर, अपनी गर्मी से करते यह सभी को हमेशा मजबूर, बेचारा सूरज भी मजबूर है, यह हर इंसानों के पहुँच से ही बहुत दूर-दूर है, बंद कर लिया अब सूरज भी है अपना दरवाजा, इंसान रोज़-रोज भुगते न भीषण गर्मी में ख़ामियाजा, बैठा था सूरज घर के बाहर माँ ने उसे ख़ुद बड़े प्यार से बुला लिया और कहा जल्दी से तू घर के अंदर अब आजा। ज़ोर-शोर से आसमाँ में गरज रहे थे  बादल, नीचे बैठकर रेत की धूल में लिपट-लिपटकर कुछ खेल खेल रहे थे बालक। सूरज को माँ ने कहा ज़रा इतनी धूप है तो क्या? मुझे उसके घर तुम जाने दो, वह छोटे बच्चे जो बैठा है, खेल रहा है अपने आँगन में, उसे ज़रा कुछ पाठ पढ़ाने दो।

ग़ज़ल

याद जब तुम्हारी मुझे आती है, कमबख्त मुझे बहुत रूलाती है। तन्हाई में अक्सर ख़ुद जीता हूँ, ग़म तुम्हारे भी हर रोज़ पीता हूँ। गुफ्तगू तुझसे ना हो कोई बात नहीं, तिरी याद ही मुझे ...

ग़ज़ल

आज  हवाओं का रूख मैंने बदलते देखा, शहर की गलियों में सांपों को पलते देखा, मौन है क्यूँ ये अपना समूचा ये शहर खौफ से, ग़ज़ब है मुल्क में आज गूंगों को बोलते देखा। तरसते हैं जिनके ...

ग़ज़ल

तुम हो परिंदा, तुम्हें उड़ना नहीं आता, फ़कत इक दिन में मुझे उड़ाना नहीं आता। शरारत से गुजर कर कुछ नहीं होता है हासिल, इसलिए तेरे सवाल मुझे समझाना नहीं आता। नफ़रत की दहकती चिं...

ग़ज़ल

चलो अब मुल्क को राह दिखाया जाए, भ्रष्टों का इस ज़हां में पर्दा उठाया जाए, ज़माना नहीं है अब चुप रहने का बेशक, शातिरों को ज़रा नेक राह दिखाया जाए। मसीहा बने बैठे हैं जो अपने इस देश में, उनसे एक-एक हाथ ज़रा अब लड़ा जाए। बना रखे हैं लुटकर जो मकां अपनी-अपनी, उनसे अपनी हक़ की बात अब किया जाए। भर रहें ग़रीबों के पैसों से जो अपनी तिजोरी, उसे यक़ीनन इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाए।। जो मकां में सदियों से है अभी तक अंधेरा, उन घरों में अब इक चिराग़  जलाया जाए।। तमाशा बने बैठे हैं जो अपने इस मुल्क में , आँख ज़रा गद्दारों से एक बार मिलाया जाए। गुमराह हैं सदियों से जो अपने घरों में अब तक, जुबां उनके अपनी हक़ के लिए खुलवाया जाए।। मदहोश हैं जो अंधी सियासत के आगे अब भी, चश्मा ज़रा सच्चाई का अब उन्हें पहनाया जाए।। तड़पते हैं,सोते जो फुट-पाथों पे अब भी ज़माने में, उनकी भी सोयी आत्मा को भी अब जगाया जाए।। बेच रहें जो सरेआम अब तक  बाजारों में झूठ, ऐसे रहनुमाओं पर से अब ज़रा पर्दा उठाया जाए।। अंधियारे हैं  जिस मकां में अब तक ए गौरव, इक-इक दीपक उन घरों में अब जलाया जाए।।

ग़ज़ल

ज़िंदगी जीना यूँ कहें तो उस ख़ुदा के हाथ में है, तुमसे मिलकर दूर-दूर रहना मुकद्दर की बात है। नहीं है मिलती अंज़ाम-ए इश्क़ ये मंज़िल साथ में, छुट जाते हैं रास्ते,मंज़िल पछताना पड़ता बाद में। तमाम रातें छोटी पड़ जाती इक नाम को भुलाने में, रहता नहीं आसां डगर जीवन का यही बात जताने में। छोड़ जाती अपनी ही ये परछाईयाँ बेशक अपना साथ, फासले बेइंतहा हो ,रह जाते अनकहे क़िस्से सुनाने में। ख़बर है नहीं बेशक तुझे ख़ुद के बारे में तुझे ए नादान, जाया नहीं करता अपना वक्त हर चीज़ तुझे यूँ बताने में। तन्हाई में कट चुकी है बेवजह अपनी तमाम ये सारी रातें,

कविता:-- दहशत

मैं सोचता हूँ कि हर दिन समाज में नया-नया साँपों का प्रजाति का बोलबाला दिखाई दे रहा है, सोचता हूँ इससे बचने के उपाय यह महज़ सिर्फ़ साँप नहीं हैं यह ज़हरीले विषधर हैं, जो समाज में अपने जहरीले विष के प्रवाह से दुषित करना चाहते हैं, कुरीतियों को बढ़ावा देना चाहते हैं, यह गर्त में मिलाना चाहते हैं समाज को, आतंक और दहशतगर्दी के बल पर अपनी सत्ता और आधिपत्य क़ायम करना चाहते हैं, यह रचना चाहते हैं इक नया अध्याय, जो उनकी दहशत और आतंक को बढ़ावा दे सकें और रोज़ बुन सके नए-नए अपराधों और  आतंकों को, तलाश करते हैं ऐसे विषधर रास्ता हर-दिन जो सुनसान और एकांत हो, जहाँ हर-दिन आतंक और दहशतगर्दी फैला सके, यह एक ऐसी गहरी सुरंग से होकर गुजरता है, जहाँ ना जाने कितनी युवा पीढ़ियां इनके दहशत, कुकृत्य और अपराधों का शिकार हैं रोकना होगा इनके बढ़ते हाथों को, ना जाने इस आतंक की आड़ में कितने मासूम भी दिन-प्रतिदिन आतंक को सब कुछ मान बैठते हैं वो भी हरक़त करने लगते हैं, रोकना होगा उनके बढ़ते हाथों को अंज़ाम देते अपराधों और दहशतगर्दी से, जो उसे पतन की ओर अग्रसर कर रहा है जो आतंक और अपराधों...