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Showing posts from January, 2021

हिंदी कविता : गांव की यादें // गौरव झा

  GAURAV JHA  ( Journalist, Writer & Columnist ) चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार  गाँव की याद आती है बहुत मेरे यार।। सिखता आ रहा हूँ,बहुत कुछ गाँवों में रहता हूँ,हर वकत बुजुर्गो के छाँवों में। चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार गाँव की  याद आती है बहुत मेरे यार।। मिलता था माँ का प्यार सदा गाँवों में जन्नत मिला है  सदा  माँ के पाँवों में।। गाँव में  मिलता बहुत लोगों का  प्यार, शहर आते बहुत कुछ खो दिया मेरे यार। चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार, गाँव की याद आती है बहुत मेरे यार।। #  <script data-ad-client="ca-pub-6937823604682678" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>

ग़ज़ल : तुम हो परिंदा / गौरव झा

          GAURAV JHA  ( Journalist, Writer & Columnist ) तुम हो परिंदा, तुम्हें उड़ना नहीं आता, फ़कत इक दिन में मुझे उड़ाना नहीं आता। शरारत से गुजर कर कुछ नहीं होता है हासिल, इसलिए तेरे सवाल मुझे समझाना नहीं आता। नफ़रत की दहकती चिंगारी हैं तेरे अंदर,प्यारे पूछते हो रोज़ सवाल, तुझे सिखना नहीं आता, नहीं है  ज़िंदगी  में कुछ भी तुझे सीखने की चाह, शायद तुम कहते उसे सही से बताना नहीं आता। जाते हो तुम समंदर के पास,कुछ उम्मीद लेकर, नदियों की धार से अपनी बात जताना नहीं आता। बिखरे पड़े,सुनसान पहाड़ों के बगल में कुछ पत्थर, कोहिनूर जैसे बेशकीमती पत्थर तुझे उठाना नहीं आता। ---@ GAURAV JHA

हिंदी कविता : स्यायी / गौरव झा

    GAURAV JHA ( Journalist, writer & Columnist ) अपने एहसासों को स्यायी से गढ़कर पन्नो पर लिख देता हूँ, तुम्हारी हो या फिर  मेरी, अंतर्मन की वेदना को सुना देता हूँ। एहसास जो है मेरे अंदर छुपे, जुबां पर उसे ही लाता हूं, वक्त मिलता जब भी, वहीं काली स्यायी से लिखी  जज़्बात तुम्हें सुनाता हूँ।। अंतर्मन के एहसासों को  शब्द रूपी मालाओं में पिरोता हूँ, कुछ लिखे जज़्बात तुम्हें सुनाता हूँ। अभिलाषा है मेरी भी कुछ ज़िंदगी में कर गुजरने की, चल पड़ती है लेखनी सच्चाई  की ओर, छोटी-सी है क़लम  स्यायी के साथ मिलकर यही बात 'गौरव'दुनिया को  इसकी ताकत बताता  हूँ। स्यायी कागज़ पर गिरती है, यह कुछ नया लिखने को कहती है, लिख लेता हूँ कुछ अंतर्मन के जज़्बात, काली स्याही से, अपने एहसासों को स्यायी से गढ़कर पन्नो पर लिख देता हूँ, तुम्हारी हो या फिर  मेरी, अंतर्मन की वेदना को सुना देता हूँ। चाहे रंग लहू का हो या स्यायी का, काली स्याही को कागज़ की  भट्टी में जलाकर लिखते रहे, लोग वाह-वाह कर-करके  जज़्बात हमारे हमेशा पढ़ते रहे।। ---@ Gaurav...

हिंदी कविता : उड़ान // गौरव झा

     GAURAV JHA (Writer, Journalist & Columnist ) आकाश में जगह नहीं होती है उड़ने की, जैसे पक्षी उड़ान भरती हो खुले नभ में, चुगती है दिन-दिन भर दाना फिर सोचती है वह भी अपने घोंसले में आना। मैं उड़ा हूँ, रूकना मुझे भी नहीं आता, सफ़र पर अकेला चला हूँ, हर विपदाओं से मैं बड़ा हूँ सीखा हूं केवल सतत् चलते जाना, आकाश में जगह  नहीं होती है उड़ने की।। सीखा हूँ मैं भी हुनर केवल  सतत् चलने की। मिले राह में चाहे पहाड़ या हो फिर चट्टान सौ-बार मुझे भी टकराना है, हर सख्त चट्टान का सीना चीरकर राह  ख़ुद नया मुझे बनाना है।। पक्षियों को  उड़ने के लिए पंख चाहिए, मेरा हौंसला ही है जो मेरी उड़ान है।। शौक है मुझे भी खुले आकाश में उड़ने की, मंज़िल की तलाश में उसी दिशा में बढ़ने की, मेरा हौंसला, जज़्बा कम है क्या? यही मेरी उड़ान है। आकाश में जगह नहीं होती है उड़ने की, जैसे पक्षी उड़ान भरती हो खुले नभ में।। ---@Gaurav Jha

हिंदी कविता : ये प्रकृति शाय़द कुछ कहना चाहती है/गौरव झा

ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे ये हवाओ की सरसराहट ये पेड़ो पर फुदकते चिड़ियों की चहचहाहट ये समुन्दर की लहरों का शोर ये बारिश में नाचते सुंदर मोर कुछ कहना चाहती है हमसे ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे ये खुबसूरत चांदनी रात ये तारों की झिलमिलाती बरसात ये खिले हुए सुन्दर रंगबिरंगे फूल ये उड़ते हुए धुल कुछ कहना चाहती है हमसे ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे ये नदियों की कलकल ये मौसम की हलचल ये पर्वत की चोटियाँ ये झींगुर की सीटियाँ कुछ कहना चाहती है हमसे ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे। @ Gaurav Jha

हिंदी आलेख : किताब // गौरव झा

   GAURAV JHA   ( Journalist, writer & Columnist ) एक किताब ही मनुष्यों के चरित्र निर्माण के साथ-साथ उसके भविष्यों को सँवारने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जैसा कि हम सब प्राय: कहते हैं कि जैसा व्यक्ति का खान-पान, रहन-सहन होते हैं,उसी प्रकार समस्त सामाजिक प्राणियों के विचार भी वैसे ही होते हैं।एक मकान की नींव की तरह होती है 'किताब', जिस पर हर मनुष्यों के जीवन की भविष्य टिकी होती है।यह एक ऐसी शक्ति है जो दुनिया के हर बेशकीमती चीज़ों से ऊपर है।हम कह सकते हैं कि------------------------------------ "एक किताब के बिना मनुष्यों का जीवन नीरस है या अधूरा  है!!" दरअसल यह एक रास्ता है जिस पथ पर चलकर सिर्फ़ बच्चों का चारित्रिक विकास ही नहीं होता बल्कि इससे उसका शारीरिक विकास होने के साथ-साथ उसका मानसिक विकास भी होता है।यह एक बेशकीमती कोहिनूर है।यह एक माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य समाज के मूल-कर्तव्यों, नीतियों, सिद्धांतों, वसूलों को समझता है। जिससे वो अंजान हैं, अपरिचित हैं। उसे गहराई से तथ्यों, पहलुओं और महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करता है।यह कहना बिल्क...

हिंदी कविता : आओ मिलकर क़दम बढ़ाएं // गौरव झा

अपने पावन मातृभूमि को हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी हमेशा क़दम बढ़ाना है। अपने भारत को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए, मातृभूमि के खातिर जनवासी को बीड़ा उठाना है। अपने पावन मातृभूमि को हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी हमेशा क़दम बढ़ाना है।। मिलेगें एकजुट होकर तब देश हमारा स्वच्छ होगा, जन-जन भारतवासी सब रोज़  तभी स्वस्थ होगा। आओं मिलकर  जन-जन को यही बात समझाना है। अपने इस पुण्य धरा के बारे में सबको कुछ बताना है। अपने पावन मातृभूमि को हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी एक-एक हाथ बढ़ाना है।। सुख-समृद्धि, खुशियां अगर अपने घर-घर लाना है, आओ मिलकर प्रण करें सब भारत को ऊंचा उठाना है। स्वस्थ रहेंगे सभी इस भूमि पर तब पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, हर मानवजाति यही बात सबको हमें  ज़रा  कहना है।। अपने पावन मातृभूमि को रोज़ हमें स्वच्छ बनाना है, ज़रा आम लोगों को भी एक-एक हाथ ज़रा बढ़ाना है।। अपने देश की गंगा, यमुना,ब्रह्मपुत्र आदि नदियों को आओ मिलकर हम सबको इसे रोज़  चमकाना है, दिन-प्रतिदिन मलीन होने से  हम सबको बचाना है। स्वच्छ रहेगा  ...

पिता पर हिंदी कविता : गौरव झा

पिता एक आस है,  बच्चों की उम्मीद है तो वह है एक पिता न जाने यह गुमसुम ख़ामोश होकर ज़िंदगी  के हर मोड़ पर न जाने कितने दर्द सहते हैं वह है सिर्फ़ पिता पर किसी से कभी कुछ नहीं कहते हैं।। अपने हृदय की असीम गहराईयों के अंदर दर्द समेटे रहते हैं, कैसा भी हो डगर? अपने अंदर हर दुःख-तकलीफ  केवल ये हमेशा सहते हैं, न जाने अपने मन में ये  कितने दर्द छुपाते हैं, फिर भी हर विपत्ति और झंझावतों में, ये सदा मुस्कुराते हैं, वो कौन है? वह केवल पिता है, ख़ुशी का लम्हा हो या दुःख का, हर गमों को दिल में समेटकर सदा ये ही हमेशा  परिवार का समूचा बोझ उठाते हैं!! पिता समूचे घर की नींव है यह हर इक घर की शान है, इनसे हर बच्चों की पहचान है।। पिता बिन यह समूचा संसार सूना है, पिता परिवार का रथ का सारथी है, जिस रथ का पहिया उन्हीं के हाथ में है। पिता ही बच्चों की आस है, पिता ही विश्वास है, पिता से ही यह जग मेरा, पिता बच्चों की सांस है।। कष्ट जब होता है,बच्चे जब बीमार होते हैं, यह हमेशा पास रहते हैं हर रिश्ता दिल से यही निभाते हैं, नींद जब रात में नहीं आती, यह बच्चे को पास सुलाते हैं।...

कविता : शब्दों की स्यायी

।         GAURAV JHA   ( Journalist, writer & Columnist )  शब्द एक नहीं अनंत है यह, काली स्यायी से उखेरते हैं जब निशा में काग़ज़ पर, कोई गति दुनिया में है क्या? जो शब्दों की गति सहज और सुलभ तरीके से पहचान सके, गिन सके गति है इसकी अनंत शायद सांय-सांय बह रही ठंडी हवाओं से भी तेज़  रूह के स्पर्श मात्र से होती है जो हलचल, अजीबो-गरीब बौखलाहट हाथों और समूचे शरीर के हर इक कोने को कँप-कँपाती हुई, शब्द ही तो है, मसलन शब्द नहीं है बल्कि इसका आवागमन  है बहोत दूर तलक, शब्द में एक सुगंध है,गंध है एक गुलाब की फूल की पंखुड़ियों की तरह, मन-मोह लेती पथिकों का, गुजरते हैं जो उस राह से, मन प्रफुल्लित हो जाता है, खिल उठता है पथिकों का चहरा शब्द ही है इसमें भी स्पर्श है, गति होती है शब्दों का भी, मन की गति से भी शायद तेज़ शब्द एक नहीं  बल्कि अनंत हैं  हृदय की धमनियों को स्पर्श करती है वो क्या है? वह केवल शब्द ही तो है, मन की गति जितना दूर तलक, जाती है उतनी तेज, गति है शब्दों की, भाव जब-जब शब्दों के समंदर में हिलोरे लेते हैं, गढ़ता है कोई...

आलेख // साहित्य समाज का आईना है //गौरव झा

।    GAURAV JHA   ( Journalist, Writer, Columnist ) साहित्य समाज का दर्पण है । एक साहित्यकार समाज की वास्तविक तस्वीर को सदैव अपने साहित्य में उतारता रहा है । मानव जीवन समाज का ही एक अंग है  मनुष्य परस्पर मिलकर समाज की रचना करते हैं । इस प्रकार समाज और मानव जीवन का संबंध भी अभिन्न है । समाज और जीवन दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं । आदिकाल के वैदिक ग्रंथों व उपनिषदों से लेकर वर्तमान साहित्य ने मनुष्य जीवन को सदैव ही प्रभावित किया है ।आज अपने देश के साहित्यकार के सामने भी एक विकट समस्या है कि लोग साहित्य से दिन-प्रतिदिन दूर होते जाते जा रहे हैं।जिस साहित्य के सहारे हमारा राष्ट्र का विकास संभव है।आज विलुप्त होती दिख रही है। खासकर छोटे-छोटे बच्चों पर दिन-प्रतिदिन बुरा प्रभाव पड़ रहा है।दर असल जिस बाल साहित्य को बच्चे कभी ध्यान से पढ़ते थे।आज परिस्थिति बिल्कुल अलग दिख रही है। साहित्यकारों को भी चाहिए,मंच से अलग हटकर कुछ ऐसी कविताएं, कहानियां लिखें।जिससे साहित्य के प्रति बच्चों का रूझान बढ़े। आज मनोरंजन से कहीं हटकर कार्य करने की जरुरत है।जिसे पढ़कर छोटे-छोटे बच्चों को कुछ सी...

आलेख:--- विश्व पटल पर पहचान दिला रही है हिंदी

।      G a urav Jha     (Writer, Journalist, columnist)      [ This article is published by shail shutra    magazine] भारत की भाषायी स्थिति और उसमें हिंदी के स्थान को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी आज भारतीय जनता के बीच राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। हिंदी की भाषागत विशेषता भी यह है कि उसे सीखना और व्यवहार में लाना अन्य भाषाओं के अपेक्षा ज्यादा सुविधाजनक और आसान है। हिंदी भाषा में एक विशेषता यह भी है कि वह लोक भाषा की विशेषताओं से संपन्न है, बड़े पैमाने पर अशिक्षित लोचदार भाषा है, जिससे वह दूसरी भाषाओं में शब्दों, वाक्य-संरचना और बोलचाल जन्य स्वीकार करने में समर्थ है। इसके अलावा ध्यान देने की बात यह है कि हिंदी में आज विभिन्न भारतीय भाषाओं का साहित्य लाया जा चुका है। विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों को हिंदी के पाठक जानते हैं, उनके बारे में जानते हैं। भारत की भाषायी विविधता के बीच हिंदी की भाषायी पहचान मुख्यत: हिंदी है। भारत के औद्योगिक प्रतिष्ठानों के आधार पर बने नगरों और महानगरों में भारत की राष्ट्रीय एकता और सामा...

प्रकृति की गोद में खूबसूरत शहर बसा है ग्वालियर // गौरव झा

      GAURAV JHA ( Journalist, writer & Columnist ) कुछ महीनों पहले हमारी इस यात्रा का आखिरी दिन था और सबसे पहले का कार्यक्रम था ग्वालियर का किला। दर असल जब हम ग्वालियर पहुँचे और आँटो से इधर–उधर भाग–दौड़ कर रहे थे तो कई जगह से ग्वालियर के किले की बाहरी दीवारों की एक झलक दिखाई पड़ी। काफी रोमांचक लगा। आज हम बिल्कुल पास से इसे देखने जा रहे थे।पर ग्वालियर शहर में थे ,हम बिल्कुल अंजान।मुझे ऐसा भी लग रहा था कि अंजान शहर,शहर के लिए बिल्कुल अपरिचित था।मन में कई तरह की बाते सोच रहा था।लेकिन जब पहुँचा।एक व्यक्ति भी मेरे साथ चला।वार्तालाप करने से पता चला कि वो खास ग्वालियर का है।मन में ही सोचा ,एक से भले दो।सब ईश्वर की कृपा थी।जब हम ट्रेन से पहली बार ग्वालियर स्टेशन उतरा।मन में काफी उत्सुकता थी,ग्वालियर किला घुमने की।और हाँ,पहले भी मैं रानी लक्ष्मीबाई की कविता और ग्वालियर के बारे में पढ़ रखा था। आँटो पकड़ी और आधे घण्टे के अन्दर 15–20 रूपये में किले के गेट तक पहुँच गये। बाहरी गेट के पास से किला बहुत साधारण सा लग रहा था लेकिन असली दृश्य अभी सामने आना बाकी था। किले ...