Skip to main content

Posts

Showing posts from January, 2020

दोहा:-- गौरव

देश का मान  हमें बढ़ाना है, संविधान को हमें बचाना है, मुल्क में हो सदा अमन-चैन, नफ़रत को ज़रा  मिटाना है। रक्षा करेंगे देश हित की सदा, गद्दारों से सदा इसे बचाना है। मन,वचन,कर्म से करेंगे नेक काम, राष्ट्र का बढ़ता रहे जग में सदा मान, जनहित की बात सदा ही करना है, मिल-जुलकर आतंक को मिटाना है। हिंदू है अपने देश की  सदा से एक पहचान, रग-रग में लहू गर्म है,यह अपना है हिंदुस्तान। रामराज्य में फैली है चहुंओर आजकल लुट, मुँह में पान रखें दिन-भर बोले यहाँ सब झूठ। भाई-भाई से लड़ रहे अब यह है अपना मुल्क, फैल रहा है हर जगह बुराई,जीत रहें हैं अब झूठ। दीपक का  जलना है गौरव सदा,मिलता इसे नाम  अपने तमश को छुपाकर बनाता यह सभी के काम। जग में जो बन बैठा दीया,उसका बढ़े सदा मान, यह जग क्या?देवता  करते सिर्फ़ उसी का सम्मान।। तन-मन में बसा है सिर्फ़ एक ही नाम, बिगड़े बनाते प्रभु सबके एक दाता राम। कितने जीवन में आए हैं मुसाफ़िर ये लोग, जैसी करनी-वैसी भरनी जीवन में तू आज भोग। डाल-डाल पे बैठा है आज तोता,बोलता यह मीठी बोल, महज़ कुछ हैं जो  एक-एक करके खोलता सबका पोल।। मज़ह...

कविता:-- प्रेम है एक शक्ति

तुमको जब भी चाहा, हृदय की गहराई से चाहा, मुझमें तुम हो, तुझमें मैं सदा हूँ, कुछ पल के लिए अपने रास्ते में तुम्हें खोजा तुम मेरे हृदय में एक शक्ति बनकर तुम मौजूद थी, मेरी हर साँसों में, मेरी हर धड़कन में बसी तुम्हीं हो, तुम्हारी चाहत में ख़ुद को एक क्षण के लिए भूल गया था मैं, अपने वजूद को भूल गया था, हम दोनों के बीच असीम प्रेम में शक्ति थी इतनी अधिक हम दोनों को ज़िंदा रखा, तुम्हें पाना या चाहना न तो मेरे हाथों में है, न उस ख़ुदा के हाथों में, सोचता हूँ कभी-कभी मिले थे क्यूँ हम दोनों इक साथ, ज़िंदगी महज़ एक इत्तिफाक है, तुमसे मिलना, चाहकर भी तुमसे दूर-दूर रहना, उलझा था ख़ुद में, ढूंढ़ रहा था तुम्हें ख़ुद के अंदर यह ढूंढ़ने का सिलसिला ने मुझे अपनों से गुमनाम कर दिया, जीवन है सतत् चलते रहने का, तुम्हारे प्रेम में ख़ुद को भूल गया, मिलना और तुमसे दूर-दूर रहना ये उस ईश्वर के हाथों में है, विधाता के बनाए हुए विधान की कथपुतली हैं हम दोनों, कोशिश करता रहा था तुमसे, तुम्हारे रूह से अलग हो जाऊं, लेकिन तुम्हारे बचपन के दिनों के कारण एक पल , एक सेकंड भी तुमसे...

सफर

सफ़र में अकेले चलता हूँ, सदा ख़ुद राहों में बढ़ता हूँ, भीड़ के साथ रहना मिरी सदा से ही फितरत नहीं, सफ़र में अकेले चलता हूँ, जानता हूँ इस ज़िंदगी में कितने लोग बेवजह आते हैं, कई प...

ग़ज़ल//कवि गौरव

इस शहर में आजकल शख़्स झूठ बोलता है, आईना ही हर-दौर में सबका राज़ खोलता है। चंद मसीहा है बना बैठा अपने शहर में आज, गज़ब है आजकल कोयले को हीरा बोलता है, राज़ की बात है बिकता है बाजारों में ईमान, देखों शहर के परिंदें भी ऊँची उड़ान उड़ता है।। सुनाने लगा है मसीहा यहाँ अपनी मन की बात, यहाँ तो हर शख़्स ही मीठी जुबान बोलता है।। गौरव ज़माने में बन बैठा है सियासत के पुजारी, इस शहर का आईना ही यहाँ पत्थर बोलता है।। अंज़ाम से डरते वो जिसके आंखों में अंगारे न हो, धरा पे हर शख़्स अभी जनहित की बात बोलता है।। अपना है ये मुल्क में इरादे रखते नहीं कभी भी नेक, आजकल मसीहा भी तो ख़ुद मीठी जुबां बोलता है। जुबां ही है जिसकी यहाँ पे हिंदी और उर्दू,ए दोस्त अदब से वहीं शख़्स सर झुकाकर यहाँ बोलता है।।

कविता:--- माँ।

विश्व के तमाम प्यारी माँ के चरणों में नमन,वंदन।वैसे माँ के लिए क्या लिखूं,क्योंकि माँ ने मुझे लिखा है।प्यारी माँ के लिए चंद लाईन प्रेषित करता हूँ।वैसे माँ शब्द को परिभाषि...

आलेख

राजनीति पर से धर्म का अंकुश हटा तो वह निरंकुश हो गई।युद्ध,प्यार और राजनीति में सब कुछ उचित-अनुचित चलता है।इस मान्यता ने उपरोक्त तीनों ही तथ्यों को निकृष्ट स्तर का बना डाला...

कविता:--- मेरा अपना गाँव

मेरी एक कविता के कुछ भाग आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ।। ------------------------------------------------------------------------------ चाहे चले जाओ,गर सात समुद्र पार गाँव की याद आती है बहुत मेरे यार।। सिखता आ रहा हूँ,बहुत कुछ गाँवों में रह...

आलेख :-- मनुष्य की वेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है कविता।

     GAURAV JHA ( Writer, Journalist, columnist) कविता शब्द नहीं है,कविता अर्थ नहीं है,कविता वह अनुभूति भी नहीं,कविता वह रीति नीति भी नहीं जिस बंधन और तुकांत में कविता दिखती है। कविता काष्ठ की अग्नि है,कविता ऋषि के ध्यान में उतरी ध्वनि है,कविता किसी संवेदना का उन्मुक्त प्रवाह हो,हो सकता है वो कोई आग हो,कविता गंधर्व की राग हो,हो सकता है बेआवाज हो।कविता एक कवि की अंतरवेदना है।साहित्यकार के जीवन में जो दुख,खुशी घटित होती है।जो समाज में रहकर अनुभव करते है।और हृदय से निकली आवाज,व्यथा का नाम ही कविता है।कविता कवि के शरीर की आत्मा होती है।       किंतु वेद जैसे अपौरुषेय कहे गए हैं कविकुलगुरु जिसे अनायास, अनपेक्षित-अनिश्चित,अलक्ष्य कह गए हैं, शायद उसे कोई इलहाम कह गया है ,कोई ईश्वरीय आदेश और ज्ञान कह गया है।कविता उतरती है,उतारी जाती है,पूरी तैयारी और छंद ध्वनि राग साधना के साथ।शेर कहे जाते हैं,नाट्य होते जाते हैं,गीत सुरों में,स्वरों में उतारे जाते हैं पूरी नजाकत- नफासत स्वागत के साथ।बस यही कविता की गति है।कविता तुलसी का लोकगीत है,सूर की अंधी ...

पेड़

वक्त कुछ ऐसा चला कि पेड़ के सारे पत्ते पेड़ से टूट गए, जो टुकड़ा था अपने ज़िगर का साथ वहीं हमेशा छोड़ गए, पता नहीं क्या? खता हुई ना जाने क्यूँ ए ख़ुदा, कि सारे पत्ते एक साथ बिनकहे रिश्ता एक साथ तोड़ गए, एक विशाल बुढ़ा पेड़ पत्ते के बिना संसार  छोड़ गए।।

कविता:--- माँ

किस राह गुजरेगा ये जो है ज़माना जानती हैं माँ, अंधे दौर में सच का राह दिखलाना जानती हैं माँ। हर मुसीबतों से ख़ुद सामना करना ये जानती है माँ, घरों में अंधेरे में यह ख़ुद दीया जलाना जानती है माँ। अभावों में घर को चलाना ख़ुद जानती है अपनी माँ, परायों को सदा मन से अपना बनाना जानती है माँ।। बुरे हालत में भी वह सदा ही मुस्कुराना जानती है माँ, अपने दिल की राज़ चुपके से वो छुपाना जानती हैं माँ। पढ़ी भले बेशक न हो लेकिन वो पढ़ाना जानती है माँ, कभी कोई रूठे तो उसे वो ख़ुद मनाना जानती है  माँ।। मुहब्बत की रोशनी को घर में  लुटाना जानती है वो माँ, अपने अंदर हर ग़म को समेटकर सहना जानती है माँ।। ब्रह्म,विष्णु,महेश ख़ुद माँ की गोद में खेलना चाहते हैं, हर दौर में ख़ुद काम को  बेहतर करना जानती है माँ।। बचपन में बच्चों को गोद में लेकर सुलाना जानती है माँ, चोट गर लगे तो ख़ुद वो माथे को सहलाना जानती है माँ। अमर गाथा है माँ कि  कोई न कभी जियादा जान सका, उसे अंदर की कहानी को कोई न कभी भी पहचान सका। समय के साथ चलना और घर को चलाना जानती है माँ, अंधेरे मकां में भी ख़ुद दिया...

कविता:--- मैं एक पत्रकार हूँ।।

मैं एक पत्रकार हूँ, बोलना सच मेरा पेशा है, लिखना सच मिरा कर्त्तव्य है, जानता हूँ इस दुनिया के भीड़ हमेशा मैं  अलग हूँ, क्योंकि ये मैं जानता हूँ कि मैं सच लिखता हूँ, समाज की बात हमेशा करता हूँ, जन-जन के बारे में सोचता हूँ, शहर में इक भी घटना जब घटित होती है परेशान रहता हूँ, अंतर्मन से चिंतित रहता हूँ, हाँ मैं भी आम इंसान हूँ, लेकिन जन की दुःख देखकर हमेशा व्यथित रहता हूँ, जानता हूं सच बोलना, सच लिखना नहीं है आसान, क़दम- क़दम पे बुराई सुनना पड़ेगा तो कहीं किसी मोड़ पर अच्छाई, बेशक सबसे अलग हूँ मैं, क्योंकि मैं जनहित की बात करता हूँ, स्वभाविक है मेरा सबसे अलग होना, हर चीज़ और विषयों की गहराई को ख़ुद मैं समझता हूँ, राहों के चुनौतियों से भी अवगत हूँ हाँ बेशक! मैं अलग हूँ सबसे, क्योंकि आँखों में अंगारें जलाने का आदी हूँ, यह जीवन है क्या? जनहित का करता हूँ निडर होकर काम, तभी लोग जानते हैं सब लोग मेरा नाम, खतरों से खेलना ही पेशा है, एक ईमानदार और कुशल पत्रकार का, जानता हूँ अलग हूँ सबसे क्योंकि मैं अपने कर्त्तव्यों, वसूलों और सिद्धांतों पर हमेशा चलता हूँ, ...

कविता:-- भारतीय सेना

अपने मुल्क के पहरेदारों को, दिल से हमेशा मेरा सलाम है, नहीं है बनना आसान सैनिक, कुर्बानी देनी पड़ती है अपने मुल्क और राष्ट्र के खातिर, दूर रहना पड़ता है परिवारों से, अपनी भारत की मिट्टी की रक्षा खातिर उन्हें मेरा दिल से सलाम है। अपना देश चैन से सब सोता है, जब वो सरहद पे डटकर जान हथेली पे रखकर वो खड़ा रहता है, इसलिए अपने मुल्क के पहरेदारों को, बार-बार मेरा दिल से सलाम है, जो आँख उठाता अपने मुल्क पे, वो जान हमेशा ही खो देता है, अपने फ़ौज आँखों में अंगारें रखते हैं, दुश्मन डरकर भागते भी दिखते हैं। सरहद पे रक्षा करना नहीं है आसान उतना, अपनी इच्छाओं को कुर्बानी देना पड़ता है, सख्त चट्टान जैसा सरहद पे, निडर होकर खड़ा रहना पड़ता है। सेना बनना नहीं है उतना आसान, उसके लिए दिल सख्त करना पड़ता है, आँख में अंगारें जलाने पड़ते हैं, इसमें घर या राष्ट्र में किसी एक को हमेशा ही सैनिको को चुनना पड़ता है। गर्मी का हो अगर मौसम, या फिर बरसे यदि उसके सिर पे ज्वालाएँ, सरहद पे डटकर उसे रहना पड़ता है, सेवा में देश के लिए हमेशा खड़ा रहना सदा सेना को पड़ता है, डरते नहीं है वो कभी...
इंतिहा है ज़रा इस क़दर ज़ुल्म की अब चुप रहो, बागवाँ के फूल सदियों से आजकल मुरझाए है, दहशत है चारों ओर यहाँ देखो और चुप रहो आतंक फैलाने वाले को कुछ न कहो चुप रहो, इस ज़माने में कौन सुनता है फ़रियाद किसकी, गुज़र रहे हो अंधेरी नगरी से देखकर चुप रहो। सैलाब आया है भ्रष्ट्रों और यहाँ देश में गद्दारों का, हवा सहमी हैं सदियों से शहर में ज़रा चुप रहो। गौरव अंधेरा मिट सकेगा नहीं इस धरा पे कभी भी लगाते आरोप सियासत में एक दूजे पे देखो चुप रहो। बंद करलो अब अपनी घर की सारी ये खिड़कियां, बहकी-बहकी हैं  ये फिजाएँ अब ज़रा चुप रहो।। ए शहर!बेहिसाब ख़ुश न हो अपनी मंज़िल पाकर, आगे है घना कोहरा  ये देखकर ज़रा तुम चुप रहो।। दहशत और महँगाई बढ़ रही है ज़ुबान पे लोगों के, ये सब देखकर  कुछ न बोलो अब ज़रा चुप रहो।।

कविता:-- राह

हो जाए पथ में चलते-चलते देर कहीं, क़दम बढ़ाकर इस दुनिया में सदा चलता हूँ, इस हाथ में क़लम है जब तक मेरी, मैं किसी से नहीं ज़रा भी घबराता हूँ, राहों में हमेशा एक मुसाफ़िर की तरह, नि...

दर्शन

दर्शन एक अति प्राचीन विचारधारा है। जैसा कि हम सब मुख्यतौर पर जानते हैं। दर्शनशास्र का अर्थ होता है-- दर्शन +शास्त्र।दर्शन कहने का मुख्य तात्पर्य होता है-- नजरिया या देखना।दर असल हम कह सकते हैं एक दार्शनिक जो अपने नज़रिए, दृष्टिकोण से हर विषय, पहलुओं और चीज़ों को देखता है।ऐसा मैं आमतौर पर मानता हूँ कि जब भी एक दार्शनिक हर विषयों पर चिंतन करता है तो उसकी सोच भी उसी अनुसार संभवतः हो जाती है।मेरे कहने का तात्पर्य यह है सोच उसकी लगातार सकारात्मक हो जाती है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि एक मनुष्य का स्वभाव,उसका मन हरेक चीज़ों को जानने का अत्यधिक पिपासु होता है।।वह अत्यधिक चीज़ों को जानने,समझने और पढ़ने में उसकी उत्सुकता अत्यधिक देखी जा सकती है।जब भी हम अपने जीवन के बारे में अत्यधिक जानने के इच्छुक होते हैं तो आमतौर पर हम अपने आसपास के चीज़ों के बारे में जानने का कार्य करते हैं। जैसे प्रकृति, पेड़-पौधे,ब्रह्यांड के बारे में जानने की इच्छा मुख्यत: प्रबल होने लगती है।                     दर असल दुन...